दिल्ली: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार को व्हाइट हाउस में दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक की। इस दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सुरक्षा, निगरानी और भविष्य को लेकर चर्चा हुई। गूगल, एंथ्रोपिक, मेटा, OpenAI, X-AI और एनवीडिया जैसी कंपनियों के प्रमुखों ने AI सिस्टम की निगरानी और सुरक्षा को लेकर एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। बैठक के दौरान ट्रम्प ने AI को ‘Super Intelligence’ यानी SI कहने से जुड़ा एग्जीक्यूटिव ऑर्डर भी साइन किया। उन्होंने कहा कि इस तकनीक को सिर्फ ‘आर्टिफिशियल’ यानी बनावटी कहना सही नहीं है। ट्रम्प ने इसे इंटरनेट से भी बड़ी तकनीक बताया।
AI सुरक्षा को लेकर कंपनियों ने क्या माना?
व्हाइट हाउस में हुए समझौते के तहत टेक कंपनियां अपने AI सिस्टम की सुरक्षा को लेकर कई स्तरों पर जांच और निगरानी के लिए तैयार हुई हैं। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि AI मॉडल तय सुरक्षा मानकों के अनुसार काम कर रहे हैं या नहीं। कंपनियां अपने AI सिस्टम की खुद जांच करेंगी। इसके साथ ही ऐसी अलग टीम भी बनाई जाएगी, जो लगातार सिस्टम पर नजर रखेगी और संभावित खतरे या किसी तरह की गड़बड़ी की पहचान करेगी। इसके अलावा AI मॉडल की जांच बाहरी विशेषज्ञों या स्वतंत्र संस्थाओं से कराने पर भी सहमति बनी है। कंपनियों के बोर्ड की एक स्वतंत्र समिति इन जांच रिपोर्टों की समीक्षा करेगी और समस्या सामने आने पर उसे दूर करने की जिम्मेदारी भी निभाएगी।
ट्रम्प बोले- AI की रेस अमेरिका और चीन के बीच
बैठक में ट्रम्प ने AI के क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच चल रही प्रतिस्पर्धा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि AI की दौड़ अब दोनों देशों के बीच है और फिलहाल अमेरिका इस मुकाबले में आगे है। ट्रम्प इससे पहले पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी AI के लिए ‘Super Intelligence’ शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं। व्हाइट हाउस की बैठक में भी उन्होंने AI को भविष्य की बेहद महत्वपूर्ण तकनीक के तौर पर पेश किया। समझौते पर ट्रम्प के साथ सुंदर पिचाई, डारियो अमोडेई, मार्क जुकरबर्ग, ग्रेग ब्रॉकमैन, इलॉन मस्क और जेन्सेन हुआंग ने भी हस्ताक्षर किए।
डेटा सेंटर को लेकर स्थानीय लोगों की भागीदारी पर जोर
बैठक में AI के लिए जरूरी डेटा सेंटर और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी चर्चा हुई। ट्रम्प ने टेक कंपनियों से कहा कि जिन जगहों पर डेटा सेंटर बनाए जाएंगे, वहां की स्थानीय कम्युनिटी को भी इन परियोजनाओं से जोड़ना चाहिए।
उनके मुताबिक कंपनियों को स्थानीय लोगों की जरूरतों का ध्यान रखना चाहिए। इसमें स्कूलों, शिक्षकों और दूसरी स्थानीय जरूरतों के लिए आर्थिक सहायता जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं।
ट्रम्प ने कहा कि डेटा सेंटर बनाने से पहले कंपनियों को स्थानीय समुदाय के साथ साझेदारी करनी चाहिए, ताकि इन प्रोजेक्ट्स का लाभ संबंधित इलाकों में रहने वाले लोगों तक भी पहुंच सके।
AI के पीछे डेटा सेंटर की भूमिका क्यों अहम?
AI से जुड़े सिस्टम को चलाने के लिए बड़ी संख्या में शक्तिशाली कंप्यूटरों की जरूरत होती है। इन कंप्यूटरों को बड़े डेटा सेंटर में रखा जाता है। यही वजह है कि जैसे-जैसे AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे डेटा सेंटर की जरूरत भी बढ़ रही है।
डेटा सेंटर AI सिस्टम के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध कराते हैं। इनके संचालन के लिए बड़ी मात्रा में बिजली की भी जरूरत होती है। इसलिए AI के विकास के साथ चिप्स, डेटा सेंटर और बिजली जैसे संसाधन भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
जुकरबर्ग और अमोडेई ने क्या कहा?
मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि व्हाइट हाउस के साथ हुए समझौते का उद्देश्य लोगों का AI पर भरोसा बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोगों और ग्राहकों को यह भरोसा होना चाहिए कि AI तकनीक उसी तरह काम करेगी, जिस तरह उसे तैयार किया गया है।
वहीं, एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई ने कहा कि AI के सुरक्षित विकास के लिए सभी कंपनियों को मिलकर काम करना होगा।
AI की रेस में चार बड़े मोर्चे
अमेरिका और चीन के बीच AI की प्रतिस्पर्धा को चार प्रमुख हिस्सों में देखा जा रहा है। पहला है *चिप्स*, जो AI सिस्टम के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता उपलब्ध कराते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र *डेटा सेंटर* हैं, जहां AI को चलाने वाले शक्तिशाली कंप्यूटर रखे जाते हैं। तीसरा है *बिजली*, क्योंकि बड़े डेटा सेंटर को लगातार भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है।
चौथा और सबसे सीधा मुकाबला *AI मॉडल* को लेकर है। इसमें यह देखा जाता है कि कौन ज्यादा तेज, सक्षम और जटिल काम करने वाला AI सिस्टम तैयार कर पाता है।
Tags: