यह देश RSS की जागीर नहीं, ओवैसी ने बीदर से बोला बड़ा हमला
आजादी की लड़ाई में भूमिका पर उठाए सवाल
बीदर। कर्नाटक के बीदर में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका पर सवाल उठाते हुए संगठन को 24 घंटे के भीतर ऐसे स्वयंसेवक का नाम बताने की चुनौती दी, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान गंवाई हो। ओवैसी ने कहा, "यह देश हमारा है और हमारा ही रहेगा। यह देश खाकी निकर पहनने और लाठी लेकर चलने वालों का नहीं, बल्कि देश के सभी नागरिकों का है।" उन्होंने कहा कि भारत किसी एक संगठन या विचारधारा की संपत्ति नहीं है।
अपने संबोधन में ओवैसी ने दावा किया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान RSS के किसी सदस्य की ब्रिटिश पुलिस की गोली से मौत नहीं हुई। उन्होंने संघ को चुनौती देते हुए कहा कि यदि ऐसा कोई व्यक्ति था तो संगठन अगले 24 घंटे में उसका नाम सार्वजनिक करे। AIMIM प्रमुख ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल गए थे, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के ऐतिहासिक संदर्भ को समझना जरूरी है।
ओवैसी ने दावा किया कि हेडगेवार खिलाफत आंदोलन के समर्थन में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे और इसी कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था। उन्होंने महात्मा गांधी और हेडगेवार से जुड़ा एक प्रसंग भी सुनाया। हालांकि, इस प्रसंग के विवरण की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ओवैसी इससे पहले भी स्वतंत्रता संग्राम में RSS की भूमिका को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। जनवरी 2026 में महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक सभा के दौरान भी उन्होंने इसी मुद्दे पर संघ को घेरा था।
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी। स्वतंत्रता आंदोलन में संगठन और उसके संस्थापक की भूमिका को लेकर लंबे समय से अलग-अलग ऐतिहासिक व्याख्याएं सामने आती रही हैं। ओवैसी ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सभी नागरिकों की समान भागीदारी से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि देश पर किसी एक संगठन का अधिकार नहीं हो सकता। फिलहाल बीदर में दिए गए इस विशेष बयान पर RSS की आधिकारिक प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हो सकी है। ओवैसी के आरोपों को उनके राजनीतिक दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में।