Mumbai. मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार को एक ऐतिहासिक क्षण तब दर्ज हुआ जब करीब बीस साल बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक साथ मंच पर दिखाई दिए। मौका था मुंबई के वर्ली डोम में आयोजित 'विजय रैली' का, जो राज्य सरकार द्वारा विवादास्पद त्रिभाषा नीति (Three Language Policy) के आदेश को रद्द करने की घोषणा के बाद आयोजित की गई थी। हालांकि इसे गैर-राजनीतिक कार्यक्रम बताया गया, लेकिन रैली का स्वर और वक्ताओं की भाषा कुछ और ही संकेत दे रही थी—मराठी अस्मिता, हिंदी थोपने का विरोध और सांस्कृतिक स्वाभिमान की पुनःस्थापना।
🔸 ठाकरे बनाम ठाकरे नहीं, अब साथ-साथ?
राज ठाकरे (मनसे अध्यक्ष) और उद्धव ठाकरे (शिवसेना-UBT प्रमुख) के एक मंच पर आने ने सियासी अटकलों को तेज कर दिया है कि क्या आने वाले मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव या अन्य स्थानीय निकाय चुनावों में दोनों दल गठबंधन करेंगे?
राज ठाकरे ने मराठी भाषा और अधिकारों पर आक्रामक रुख अपनाते हुए राज्य सरकार पर निशाना साधा।
वहीं उद्धव ठाकरे ने डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे के “जय गुजरात” बयान और बीजेपी की विभाजनकारी राजनीति पर करारा प्रहार किया।
हालांकि, उद्धव ने एकजुटता की बात की, पर राज ने गठबंधन की बात पर राजनीतिक दूरी बनाए रखी।
🔹 अगर गठबंधन होता है तो क्या होगा असर?
यदि शिवसेना (UBT) और मनसे के बीच गठजोड़ होता है, तो महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव संभव हैं:
🟡 मराठी बहुल क्षेत्रों—मुंबई, ठाणे, नासिक, पुणे में यह गठजोड़ प्रभावशाली हो सकता है।
🟡 खासकर वर्ली, सेवरी, लालबाग, परेल, वडाला, भायखला, विक्रोली, चेंबूर जैसे इलाकों में यह गठबंधन मजबूत जनाधार बन सकता है।
🟡 इससे मराठी वोट बैंक का ध्रुवीकरण हो सकता है और बीजेपी, कांग्रेस और शिंदे गुट के लिए खतरे की घंटी बज सकती है।
🔻 लेकिन राह इतनी आसान नहीं...
यह गठबंधन चुनौतीपूर्ण भी है:
दोनों दलों की विचारधाराएं, संगठनात्मक ढांचा और नेतृत्व शैली अलग-अलग हैं।
सीट बंटवारे, लीडरशिप प्रोजेक्शन, और भूमिकाओं की संतुलन जैसे सवालों पर भीतरी असहमति आ सकती है।
दो दशक की प्रतिद्वंद्विता का इतिहास भी दोनों नेताओं के बीच पूर्ण विश्वास की राह में रोड़ा बन सकता है।
🔍 भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा?
दिलचस्प बात यह है कि यदि ठाकरे बंधुओं का गठबंधन मराठी वोटों को एकजुट करता है, तो
गैर-मराठी हिंदुत्व समर्थक वोटर्स बीजेपी की ओर झुक सकते हैं।
ऐसे में भाजपा को शहरी सीटों पर अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।
यह समीकरण शिंदे गुट और कांग्रेस दोनों की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जो आंशिक रूप से मराठी वोट बैंक पर ही निर्भर हैं।