रिटायर्ड हाईकोर्ट जजों की सुविधाओं पर SC का बड़ा सुझाव, पूरे देश में बनेगी एक नीति?
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और जजों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली सुविधाओं को लेकर देशभर में एक समान व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई है। अदालत के सामने केंद्र सरकार ने बताया कि इस विषय पर एक समिति गठित करने का फैसला किया जा चुका है। हालांकि, समिति के अध्यक्ष को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि समिति की अध्यक्षता किसी पूर्व हाईकोर्ट मुख्य न्यायाधीश को दी जानी चाहिए। केंद्र ने इस सुझाव पर विचार करने की बात कही है और 28 सितंबर को अदालत के सामने अपना रुख रखने की जानकारी दी है।
पूर्व सचिव स्तर के अधिकारी को अध्यक्ष बनाने की थी तैयारी
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने समिति को लेकर सरकार की तैयारी की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि समिति के प्रमुख के तौर पर पूर्व सचिव स्तर के अधिकारी को रखने का फैसला किया गया है।
इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने सुझाव दिया कि समिति का नेतृत्व किसी ऐसे व्यक्ति को करना अधिक उपयुक्त होगा जो खुद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रह चुका हो। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत की इस राय पर सहमति जताई। अब केंद्र 28 सितंबर को इस संबंध में अपना जवाब देगा।
अलग-अलग राज्यों में अलग हैं रिटायर्ड जजों की सुविधाएं
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा सेवानिवृत्त हाईकोर्ट जजों को मिलने वाली सुविधाओं में राज्यों के बीच अंतर का है। अदालत के अनुसार, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली कई बुनियादी सुविधाओं के नियम सभी राज्यों में समान नहीं हैं।
इन सुविधाओं में ड्राइवर, सुरक्षा व्यवस्था, घरेलू मदद, टेलीफोन, चिकित्सा खर्च और यात्रा के दौरान सरकारी आवास में ठहरने जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। कुछ राज्यों में इन सुविधाओं के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान है, लेकिन उसकी राशि और नियम अलग-अलग हो सकते हैं।
ड्राइवर और सुरक्षा भत्ते को लेकर भी सवाल
सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कुछ राज्यों की ओर से ड्राइवर और सुरक्षा कर्मियों के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता की पर्याप्तता पर सवाल उठाया। अदालत ने यह जानना चाहा कि क्या करीब 45 से 50 हजार रुपये की राशि में ड्राइवर और सुरक्षा अधिकारी जैसी सेवाएं उपलब्ध कराना व्यावहारिक है।
अदालत की चर्चा से यह स्पष्ट हुआ कि केवल सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके लिए तय आर्थिक व्यवस्था भी व्यावहारिक होनी चाहिए। इसी वजह से पूरे देश में एक समान नीति बनाने का मुद्दा महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जुलाई से चल रही है समिति बनाने की प्रक्रिया
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी केंद्र को समिति बनाने का निर्देश दे चुका है। 20 जुलाई को अदालत ने केंद्र को दो सप्ताह के भीतर समिति गठित करने और समिति से तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा था। इसके बाद 20 अगस्त को केंद्र को समिति गठित करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया।
मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों के संगठन के अध्यक्ष जस्टिस वीएस डेव की ओर से दायर अवमानना याचिका से जुड़ा है। याचिका में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सुरक्षा और अन्य सुविधाओं से संबंधित मुद्दे उठाए गए हैं।
अब 28 सितंबर को केंद्र के जवाब के बाद समिति की अध्यक्षता और उसकी संरचना को लेकर तस्वीर स्पष्ट हो सकती है। इसके बाद राज्यों के बीच सुविधाओं में मौजूद अंतर को देखते हुए एक राष्ट्रीय स्तर की समान व्यवस्था तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।