धर्म परिवर्तन के मामले में चार आरोपियों को राहत, हाईकोर्ट ने FIR और चार्जशीट की रद्द
जानें पूरा मामला.
बॉम्बे हाईकोर्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप से जुड़े मामले में चार लोगों के खिलाफ FIR और चार्जशीट रद्द कर दी है। आरोप था कि एक दंपती को ईसाई धर्म अपनाने के बदले पैसे, बच्चों की पढ़ाई का खर्च और घर बनवाने का प्रस्ताव दिया गया था। अदालत ने कहा कि इन आरोपों से किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने का अपराध साबित नहीं होता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कथित घटना के समय महाराष्ट्र में संबंधित धर्मांतरण विरोधी कानून लागू नहीं था।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए चार लोगों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (FIR) और दाखिल चार्जशीट को रद्द कर दिया है। मामला महाराष्ट्र के अमरावती का है, जहां एक दंपती पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया गया था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, दंपती को धर्म बदलने के बदले आर्थिक सहायता, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और घर बनवाने का भरोसा दिया गया था। हालांकि, अदालत ने कहा कि इन आरोपों के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि आरोपियों ने किसी धर्म या धार्मिक समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अपराध किया है।
दंपती को पैसे और दूसरी सुविधाएं देने का आरोप
मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि चार लोगों ने उसे और उसकी पत्नी को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया। आरोप के मुताबिक, इसके बदले हर महीने आर्थिक सहायता देने की बात कही गई थी। इसके बाद आरोपियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अदालत से अपने खिलाफ दर्ज FIR और दाखिल चार्जशीट को निरस्त करने की मांग की।
धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप पर अदालत की टिप्पणी
मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में जस्टिस एम. डब्ल्यू. चांदवानी ने की। अदालत ने आरोपों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को धर्म बदलने के लिए कहने या उस पर दबाव डालने के आरोप से अपने आप यह साबित नहीं होता कि किसी धार्मिक समुदाय का अपमान किया गया है।
अदालत के अनुसार, आरोपियों के खिलाफ अधिकतम यह कहा जा सकता है कि उन्होंने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव डाला। लेकिन केवल इस आरोप के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से काम किया।
कोर्ट ने माना कि आरोपों से धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने से जुड़ा अपराध स्थापित नहीं होता।
आरोपियों ने अदालत में क्या दलील दी?
चारों आरोपियों ने अदालत में कहा कि उनका उद्देश्य किसी धर्म का अपमान करना या किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं था। उन्होंने दलील दी कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों से यह साबित नहीं होता कि उन्होंने जानबूझकर और गलत मंशा से धार्मिक भावनाओं को आहत किया।
अदालत ने मामले के तथ्यों और आरोपों की समीक्षा की। इसके बाद उसने पाया कि संबंधित अपराधों को साबित करने के लिए जरूरी आधार इन आरोपों से सामने नहीं आते। इसी निष्कर्ष के आधार पर FIR और चार्जशीट को रद्द करने का फैसला सुनाया गया।
घटना के समय लागू नहीं था धर्मांतरण विरोधी कानून
इस मामले में कानून लागू होने की तारीख भी महत्वपूर्ण रही। कथित घटना वर्ष 2025 की बताई गई है। अदालत ने ध्यान दिया कि उस समय महाराष्ट्र में प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराने पर रोक लगाने वाला संबंधित कानून लागू नहीं हुआ था।
दिए गए विवरण के अनुसार, महाराष्ट्र में धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा और गैरकानूनी धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने से संबंधित कानून 28 अगस्त 2026 से लागू हुआ। अदालत ने कहा कि बाद में लागू किए गए कानून को उससे पहले हुई कथित घटना पर लागू नहीं किया जा सकता। इस कानूनी पहलू को भी मामले पर विचार करते समय ध्यान में रखा गया।
अमरावती के चार लोगों के खिलाफ कार्रवाई रद्द
हाईकोर्ट से राहत पाने वालों में जोसेफ खुड़ावंत, उनके बेटे विक्टर खुड़ावंत, बहू एल्विना खुड़ावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर शामिल हैं। चारों अमरावती के निवासी हैं। इनके खिलाफ शिकायत के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया था और आगे चलकर चार्जशीट भी दाखिल की थी। आरोपियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने चारों के खिलाफ दर्ज FIR और चार्जशीट रद्द कर दी।
इस फैसले में अदालत ने आरोपों के आधार पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अपराध साबित होने और बाद में लागू हुए कानून को पुरानी घटना पर लागू करने के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया।