चीन के सिर्फ 1 FDI प्रस्ताव को मिली मंजूरी, हांगकांग-सिंगापुर आगे

Update: 2026-08-02 15:40 GMT

नई दिल्ली। भारत सरकार ने विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को लेकर पिछले वित्त वर्ष में कई देशों के प्रस्तावों को मंजूरी दी, लेकिन चीन से आए निवेश प्रस्तावों पर सख्ती जारी रही। आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच भारत ने चीन के केवल एक एफडीआई प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस प्रस्ताव का मूल्य करीब एक करोड़ रुपये था। वहीं, हांगकांग और सिंगापुर जैसे देशों से आए कई निवेश प्रस्तावों को सरकार ने स्वीकृति प्रदान की।

उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में भारत सरकार ने कुल 63 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी, जिनकी कुल अनुमानित कीमत 10,292.67 करोड़ रुपये यानी करीब 1.18 अरब डॉलर रही। इनमें चीन का योगदान बेहद सीमित रहा। चीन से केवल एक प्रस्ताव को मंजूरी मिलने से दोनों देशों के बीच निवेश संबंधों में जारी सतर्कता साफ दिखाई देती है।

भारत ने अप्रैल 2020 में एफडीआई नियमों में बदलाव करते हुए उन देशों से आने वाले निवेश के लिए सरकारी मंजूरी को अनिवार्य कर दिया था, जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करते हैं। यह फैसला कोरोना महामारी के दौरान लिया गया था, जब आशंका जताई गई थी कि आर्थिक दबाव झेल रही भारतीय कंपनियों का विदेशी संस्थाएं अधिग्रहण कर सकती हैं। इसी के तहत चीन समेत पड़ोसी देशों के निवेश प्रस्तावों की जांच प्रक्रिया को कड़ा किया गया।

आंकड़ों के अनुसार, हांगकांग से आए 13 एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इन प्रस्तावों का कुल मूल्य 610.42 करोड़ रुपये रहा। हालांकि हांगकांग चीन का विशेष प्रशासनिक क्षेत्र है, लेकिन भारत निवेश प्रस्तावों की प्रक्रिया में इसे अलग श्रेणी में देखता है। वहीं, सिंगापुर निवेश के मामले में सबसे बड़े स्रोत के रूप में सामने आया। सिंगापुर से आए पांच प्रस्तावों को मंजूरी मिली, जिनकी कुल कीमत 3,259.88 करोड़ रुपये रही।

सिंगापुर के बाद ब्रिटेन का स्थान रहा। ब्रिटेन से जुड़े पांच एफडीआई प्रस्तावों को मंजूरी दी गई, जिनका कुल मूल्य 2,477.67 करोड़ रुपये था। इसके अलावा थाईलैंड से आए दो प्रस्तावों को भी स्वीकृति मिली, जिनकी कीमत करीब 1,600 करोड़ रुपये रही।

भारत में चीनी निवेश की स्थिति लंबे समय से सीमित रही है। अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में आए कुल एफडीआई इक्विटी प्रवाह में चीन की हिस्सेदारी केवल 0.32 प्रतिशत रही। वैश्विक स्तर पर भारत में निवेश करने वाले देशों की सूची में चीन 23वें स्थान पर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और सुरक्षा चिंताओं के कारण निवेश संबंधों में सावधानी बरती जा रही है। सरकार रणनीतिक क्षेत्रों में विदेशी निवेश को लेकर विशेष सतर्कता अपना रही है, ताकि आर्थिक हितों के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी ध्यान में रखा जा सके।

हालांकि भारत विदेशी निवेश को बढ़ावा देने की नीति पर आगे बढ़ रहा है और कई देशों के निवेश प्रस्तावों को तेजी से मंजूरी दे रहा है। सरकार का लक्ष्य है कि देश में अधिक पूंजी आए, नए उद्योग स्थापित हों और रोजगार के अवसर बढ़ें। लेकिन चीन से जुड़े निवेश मामलों में मंजूरी प्रक्रिया अब भी कड़ी जांच के बाद ही आगे बढ़ रही है।

इस तरह पिछले वित्त वर्ष के एफडीआई आंकड़े बताते हैं कि भारत ने एक ओर वैश्विक निवेशकों के लिए अपने दरवाजे खुले रखे हैं, वहीं चीन से आने वाले निवेश को लेकर अपनी सतर्क नीति को भी बरकरार रखा है।

Tags:    

Similar News