दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी में पार्टी पदाधिकारियों, राज्य प्रभारियों और संगठन मंत्रियों की नियुक्ति के बाद अब संसदीय बोर्ड, केंद्रीय चुनाव समिति और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन पर नजर है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संसदीय बोर्ड के गठन की प्रक्रिया को लेकर शुरुआती स्तर पर काम शुरू कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, संसदीय बोर्ड में बदलाव का ऐलान पितृ पक्ष के बाद अक्टूबर में किया जा सकता है। 12 सदस्यों वाले इस बोर्ड में करीब आधे सदस्यों को बदले जाने की चर्चा है। हालांकि, नए सदस्यों के नाम को लेकर अभी अंतिम घोषणा नहीं हुई है।
येदियुरप्पा और जटिया को लेकर बदलाव की चर्चा
रिपोर्ट के मुताबिक, बीएस येदियुरप्पा और डॉ. सत्यनारायण जटिया को संसदीय बोर्ड से हटाया जा सकता है। दोनों नेताओं की उम्र 80 साल से ज्यादा है और उनके स्थान पर जाति, वर्ग तथा क्षेत्रीय समीकरणों के लिहाज से उपयुक्त माने जाने वाले नेताओं को जगह दिए जाने की संभावना बताई जा रही है। हालांकि, यह अभी संभावित बदलाव के तौर पर ही सामने आया है। अंतिम फैसला पार्टी की ओर से नामों की घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा। संसदीय बोर्ड में बदलाव के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखे जाने की चर्चा भी है।
महामंत्री और महिला नेता को जगह मिलने की संभावना
संसदीय बोर्ड में पार्टी के किसी महामंत्री को शामिल करने पर भी विचार किए जाने की बात कही जा रही है। खबर के मुताबिक, विनोद तावड़े और सुनील बंसल में से किसी वरिष्ठ महामंत्री या किसी अन्य महामंत्री को बोर्ड में जगह मिल सकती है। इसके अलावा लंबे समय बाद किसी मुख्यमंत्री को भी भाजपा की इस शीर्ष संस्था में शामिल किए जाने की संभावना बताई जा रही है। भाजपा वर्तमान में 21 राज्यों में सत्ता में है। नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री रहते अलग-अलग समय पर संसदीय बोर्ड के सदस्य रह चुके हैं। इसके साथ ही बोर्ड में पहले सदस्य रहे एक नेता और एक महिला नेत्री को भी शामिल किए जाने की चर्चा है।
संसदीय बोर्ड की भूमिका क्या है?
भाजपा का संसदीय बोर्ड पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले निकायों में शामिल है। पार्टी के दस्तावेजों के अनुसार, बोर्ड संगठन की विभिन्न इकाइयों को दिशा देने और चुनाव तथा विधायी मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में भूमिका निभाता है। चुनाव से जुड़े मामलों में संसदीय बोर्ड की भूमिका केंद्रीय चुनाव समिति से भी जुड़ी है। भाजपा के पार्टी दस्तावेज के मुताबिक, केंद्रीय चुनाव समिति में संसदीय बोर्ड के सदस्य शामिल होते हैं और यह समिति संसद तथा राज्य विधानसभाओं के लिए उम्मीदवारों के अंतिम चयन का काम करती है।
मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद से जुड़े फैसलों में भूमिका
संसदीय बोर्ड की भूमिका पार्टी के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक और संगठनात्मक फैसलों तक मानी जाती है। विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर फैसला और चुनाव के बाद मुख्यमंत्री के चयन जैसे मामलों में बोर्ड की भूमिका हो सकती है। इसी तरह प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे पदों के लिए नाम की सिफारिश करने का अधिकार भी पार्टी के संविधान में बोर्ड से जुड़ा बताया गया है। बहुमत मिलने के बाद सरकार गठन से जुड़े मामलों में भी बोर्ड मार्गदर्शन दे सकता है। इसके अलावा पार्टी की ऐसी नीतियों पर विचार करने की जिम्मेदारी भी बोर्ड के पास हो सकती है, जिन्हें संगठन ने पहले औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
संगठन और अनुशासन के मामलों पर भी नजर
संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारियां सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रहतीं। पार्टी संगठन की विभिन्न इकाइयों को दिशा-निर्देश देने और उनके कामकाज पर नजर रखने में भी इसकी भूमिका बताई गई है। पार्टी के सांसदों, विधायकों या राज्य संगठन के पदाधिकारियों से जुड़े अनुशासन के मामलों पर भी बोर्ड विचार कर सकता है। इसके अलावा राजनीतिक गठबंधन जैसे बड़े फैसलों में भी संसदीय बोर्ड की भूमिका बताई जाती है। अब भाजपा के सामने संसदीय बोर्ड के साथ केंद्रीय चुनाव समिति और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन का अगला चरण है। बोर्ड में किन नेताओं को जगह मिलती है और किन मौजूदा सदस्यों को बदला जाता है, इसकी तस्वीर पार्टी की आधिकारिक घोषणा के बाद साफ होगी।