गगरेट। अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का तिरंगा शान से लहराने वाले पैरा एथलीट निषाद कुमार को आखिर सरकारी नौकरी पाने के लिए और कितने इम्तिहान देने होंगे? पैरा ओलंपिक, पैरा वल्र्ड एथलेटिक्स चैंपियनशिप और पैरा एशियन गेम्स जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके निषाद कुमार ने देश को कई पदक दिलाए हैं। हाल ही में जापान में आयोजित पैरा एशियन गेम्स में दो स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने एक बार फिर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है। इसके बावजूद उन्हें स्थायी सम्मान के रूप में सरकारी नौकरी मिलने का इंतजार है।
निषाद के परिजन खेल मंत्री से लेकर सरकार के समक्ष कई बार उन्हें सरकारी नौकरी देने की मांग उठा चुके हैं, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है। सवाल यह है कि जब देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने वाले खिलाड़ी भी अपनी प्रतिभा साबित करने के बाद सरकारी सम्मान के इंतजार में हैं, तो आखिर खिलाडिय़ों को प्रोत्साहित करने के दावों का वास्तविक लाभ कब मिलेगा। ऐसे में सरकार से उम्मीद है कि वह निषाद की उपलब्धियों को उचित सम्मान देते हुए उन्हें नियमानुसार सरकारी नौकरी देने पर सकारात्मक निर्णय लेगी।
निषाद कुमार जैसी प्रतिभाओं को नकद पुरस्कार देकर सम्मानित के साथ उनकी खेल प्रतिभा और अनुभव का उपयोग प्रदेश के युवाओं को तराशने में भी किया जाए। सरकार को चाहिए कि निषाद कुमार जैसे उम्दा खिलाडिय़ों को युवा सेवाएं एवं खेल विभाग में जिला खेल अधिकारी जैसे पदों पर नियुक्त करने की दिशा में गंभीरता से विचार करे, ताकि वे युवाओं को एथलेटिक्स की बारीकियां सिखाकर भविष्य के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार कर सकें।
जिला ऊना का खेल इतिहास भी इस सवाल को और प्रासंगिक बनाता है। जिले ने ओलंपियन स्वर्गीय चरणजीत सिंह और ओलंपियन दीपक ठाकुर जैसे हॉकी के नायाब हीरे देश को दिए हैं। चरणजीत सिंह ने अपनी प्रतिभा से भारतीय हॉकी को गौरवान्वित किया, लेकिन उनकी विरासत को स्थायी पहचान देने के लिए जिले में किसी खेल मैदान का नाम उनके नाम पर रखे जाने जैसी पहल भी अपेक्षित रही है। यदि निषाद कुमार जैसे विश्वस्तरीय एथलीट प्रदेश के युवाओं को एथलेटिक्स की बारीकियां सिखाएं, तो पहाड़ की धरती से भी कई ऐसे खिलाड़ी तैयार हो सकते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश के लिए पदक जीत सकें।
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