आतंकवाद से जुड़े देशों को संवेदनशील तकनीक की पहुंच से दूर रखने की जरूरत: भारत
संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति में भारत ने दुनिया के देशों से कहा है कि ऐसी संवेदनशील तकनीकों का हस्तांतरण रोकने के लिए सतर्क रहें, जिन्हें हथियार बनाने में इस्तेमाल किया जा सकता है, खासकर उन देशों को जिनका आतंकवाद से संबंध रहा है।
सोमवार को फर्स्ट कमेटी में बोलते हुए जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद आलोक कुमार सुमन ने कहा, "भारत इस बात को लेकर बेहद चिंतित है कि कहीं सामूहिक विनाश के हथियार आतंकवादी संगठनों या गैर-राज्य तत्वों के हाथ न लग जाएं।"
उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत स्पष्ट रूप से उसी की ओर था। सुमन ने कहा, "हम सभी सदस्य देशों से अपील करते हैं कि वे संवेदनशील तकनीक के हस्तांतरण या उसके फैलाव को लेकर सतर्क रहें, खासकर उन देशों के मामले में जिनका परमाणु या अन्य तकनीकों के प्रसार का रिकॉर्ड रहा है या जिनके आतंकवाद से संबंध रहे हैं।"
पाकिस्तान पर लंबे समय से लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। इसके अलावा अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को वहां शरण मिलने का मुद्दा भी अक्सर उठाया जाता है।
बिहार के गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सुमन, संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधिमंडल के दूसरे दल का हिस्सा हैं। उन्होंने समिति को याद दिलाया कि 2002 से भारत संयुक्त राष्ट्र में 'आतंकवादियों को सामूहिक विनाश के हथियार हासिल करने से रोकने के उपाय' शीर्षक से एक प्रस्ताव पेश करता रहा है।
यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया जाता रहा है और इसमें सभी सदस्य देशों से अपील की जाती है कि वे आतंकवादियों को सामूहिक विनाश के हथियार और उन्हें पहुंचाने वाले साधन हासिल करने से रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन करें।
प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे जरूरी कदम उठाएं और उन्हें मजबूत करें, जिससे आतंकवादी समूहों को सामूहिक विनाश के हथियार, उनसे जुड़ी तकनीक या उन्हें बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री तक पहुंच न मिल सके।
सुमन ने कहा कि भारत 'रासायनिक हथियार सम्मेलन' में ऐसे बदलावों का समर्थन करता है, जिनसे निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सके। उनका कहना था कि अब यह खतरा बढ़ रहा है कि आतंकवादी जैसे गैर-राज्य तत्व भी ऐसे हथियार हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए भारत के प्रयासों का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि पिछले दिसंबर में नई दिल्ली में 'जैविक हथियार सम्मेलन' की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। यह संधि जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण और हस्तांतरण पर रोक लगाती है।
सुमन ने कहा कि इस सम्मेलन में 80 देशों ने हिस्सा लिया था। इससे जैविक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत की क्षमता सामने आई। साथ ही यह भी उजागर हुआ कि आने वाले वर्षों में इस समझौते को दिशा देने में ग्लोबल साउथ के देशों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।