नई दिल्ली: जम्मू में विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) के अध्यक्ष मिथुन मनहास के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली एक अर्जी खारिज कर दी है। उन पर आरोप था कि उन्होंने आयु-वर्ग क्रिकेट (age-group cricket) में फायदा उठाने के लिए अपनी जन्मतिथि में हेरफेर की थी।
इस साल अगस्त में, सेवानिवृत्त वरिष्ठ डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (DSP) और जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (JKCA) के पूर्व संयुक्त मानद सचिव सुदर्शन मेहता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 175(3) के तहत एक याचिका दायर की थी।
मेहता ने मनहास पर धोखाधड़ी और जालसाजी का आरोप लगाया था। उनका दावा था कि दिल्ली के पूर्व बल्लेबाज ने JKCA और दिल्ली एंड डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (DDCA) के तहत राष्ट्रीय सब-जूनियर और जूनियर टूर्नामेंटों में चयन पाने के लिए दो अलग-अलग जन्मतिथियों का इस्तेमाल किया था।
शिकायतकर्ता ने नागबानी स्थित महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कॉलेजिएट (MHAC) स्कूल के एक ईमेल का हवाला देते हुए कहा कि स्कूल के रिकॉर्ड में मनहास की जन्मतिथि 9 दिसंबर, 1977 दर्ज है, जबकि DDCA की वेबसाइट पर यह 12 अक्टूबर, 1979 है। उन्होंने बताया कि इससे पहले उन्होंने नवाबाद पुलिस स्टेशन और SP सिटी नॉर्थ, जम्मू के पास शिकायत की थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
जम्मू के सब-जज और विशेष रेलवे मजिस्ट्रेट, संदीप सिंह सेन की अदालत ने इस मामले में नवाबाद पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) से तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी।
पुलिस जांच में पाया गया कि जालसाजी और हेरफेर के आरोपों को साबित नहीं किया जा सका। जांच में सामने आया कि मनहास की जन्मतिथि उनकी CBSE मार्कशीट, पैन कार्ड, आधार कार्ड और उनके नियोक्ता (ONGC) के रिकॉर्ड में एक समान—12 सितंबर, 1977—दर्ज है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जन्मतिथि में कथित अंतर के कारण मनहास को जूनियर क्रिकेट में कोई अनुचित लाभ नहीं मिला था, और क्रिकेट संस्थाओं की ओर से उन्हें उनकी जन्मतिथि के आधार पर कोई विशेष छूट या सुविधा नहीं दी गई थी। अपने आदेश में, अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने मुख्य रूप से DDCA की वेबसाइट से डाउनलोड की गई जानकारी की एक फोटोकॉपी पर भरोसा किया था। शिकायतकर्ता ने एसोसिएशन का कोई ऐसा मूल या प्रमाणित दस्तावेज़ पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि मनहास ने कोई जाली प्रमाणपत्र जमा किया था या कोई झूठा बयान दिया था।
अदालत ने टिप्पणी की, "यह बताना ज़रूरी है कि केवल दो प्रविष्टियों (entries) में अंतर होने भर से, बिना किसी अन्य सबूत के, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई जालसाज़ी या धोखाधड़ी हुई है।" अदालत ने आगे कहा कि जालसाज़ी से जुड़े आपराधिक कानून के तहत यह साबित होना ज़रूरी है कि कोई झूठा दस्तावेज़ बनाया गया था और ऐसा करने के पीछे बेईमानी या धोखाधड़ी का इरादा था।
अदालत ने यह भी कहा कि वेबसाइट पर मौजूद ऐसी जानकारी से ज़्यादा से ज़्यादा यह सवाल उठ सकता है जिसकी पुष्टि संबंधित एसोसिएशन द्वारा की जानी चाहिए; इसे उम्र का पक्का सबूत या जालसाज़ी का सबूत नहीं माना जा सकता।
अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि मामले का संज्ञान लेने से पहले (pre-cognisance stage पर) जाँच के आदेश देने की शक्ति का इस्तेमाल, बिना पुष्टि किए गए अनुमानों और कयासों के आधार पर अपनी निजी शिकायतों को सुलझाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई शुरुआती सबूत (prima facie material) नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मनहास ने कोई दस्तावेज़ जाली बनाया था या अनुचित लाभ पाने के लिए जानबूझकर कोई झूठी जानकारी दी थी। इसलिए, अदालत ने इस अर्ज़ी को 'पर्याप्त आधार न होने' के कारण खारिज कर दिया।