New York. न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए बदलती वैश्विक व्यवस्था पर भारत का दृष्टिकोण रखा। उन्होंने कहा कि दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और 1945 के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था अब नई वास्तविकताओं के लिए जगह बना रही है। जयशंकर ने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में अंतरराष्ट्रीय समझ को लगातार और मजबूती से बढ़ावा देना जरूरी है। दुनिया में आर्थिक संतुलन की प्रक्रिया पहले से चल रही है और राजनीतिक स्तर पर भी बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। उन्होंने सांस्कृतिक संतुलन को इस प्रक्रिया का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू बताते हुए इसे आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
विदेश मंत्री ने कहा, “वैश्वीकृत दुनिया में हमें लगातार और मजबूती से अंतरराष्ट्रीय समझ को बढ़ावा देना चाहिए। आर्थिक पुनर्संतुलन की प्रक्रिया अच्छी तरह आगे बढ़ रही है। राजनीतिक पुनर्संतुलन भी दिखाई दे रहा है और तीसरे पहलू यानी सांस्कृतिक पुनर्संतुलन को अब आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दुनिया अब बहुध्रुवीय व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ चुकी है। उनके मुताबिक, 1945 के बाद की वैश्विक व्यवस्था नई वास्तविकताओं को रास्ता दे रही है। हालांकि इस बदलाव के साथ तालमेल बैठाने, नई परिस्थितियों को स्वीकार करने और उनके अनुरूप व्यवस्था में परिवर्तन करने की प्रक्रिया आसान नहीं होगी।
जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल को भी इसी बदलाव से जोड़ते हुए कहा कि आज दुनिया में दिखाई दे रही अस्थिरता का बड़ा हिस्सा इन कठिनाइयों से निकल रहा है। पुरानी व्यवस्थाओं से नई वास्तविकताओं की ओर बढ़ने की प्रक्रिया में समायोजन और स्वीकार्यता जरूरी होगी। विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक स्तर पर हो रहे बदलावों को एक साथ देखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आर्थिक पुनर्संतुलन के साथ राजनीतिक बदलाव भी दिखाई देने लगा है और अब सांस्कृतिक पुनर्संतुलन को भी आगे ले जाना होगा।
जयशंकर ने कहा कि दुनिया स्वभाव से ही विविध है और उसका अधिक लोकतांत्रिक भविष्य की ओर बढ़ना रोका नहीं जा सकता। उनके बयान में वैश्विक व्यवस्था में अलग-अलग देशों और समाजों की बदलती भूमिका तथा नई वास्तविकताओं को स्वीकार करने की आवश्यकता पर जोर दिखाई दिया। UNGA के मंच से जयशंकर ने स्पष्ट किया कि वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। उनके मुताबिक यह बदलाव आसान नहीं होगा और इसके कारण कई तरह की चुनौतियां तथा उथल-पुथल सामने आ सकती हैं, लेकिन एक विविध दुनिया का अधिक लोकतांत्रिक भविष्य की ओर बढ़ना जारी रहेगा।