नेहरू के दामाद फिरोज गांधी ने संसद में एलआईसी घोटाले का खुलासा किया था जिसमें केंद्र सरकार की फजीहत हुई थी, केंद्रीय वित्तमंत्री का हुआ था इस्तीफा
पप्पू फरिश्ता
इतिहास के पन्नों से जरा याद करो.... आजाद भारत का पहला वित्तीय घोटाला साल 1957 में जवाहर लाल नेहरू के कांग्रेस सरकार में हुआ था जिसका खुलासा उन्हीं के दामाद और तत्कालीन रायबरेली के सांसद फिरोज गांधी ने किया था। कोलकाता के एक सटोरिया और व्यापारी हरिदास मूंदड़ा ने अपनी कंपनी के बोगस शेयर एलआईसी को बेच दिए थे। असल में मूंदड़ा की कंपनी 1 करोड़ 20 लाख की थी लेकिन उसकी कंपनी पर 5.50 करोड़ का कर्ज हो गया था। हरिदास मूंदड़ा ने उस वक्त केंद्रीय वित्त मंत्री टीटी कृष्णमाचारी के विशेष वित्त सचिव एचएम पटेल से भेंट कर उनको लालच देकर और कुछ पैसे खिलाकर और एलआईसी के अधिकारियों पर दबाव डाल कर अपनी कंपनी के शेयर एआईसी को बेचने के लिए मनाया और पटेल को यह बताया कि इससे उसकी कंपनी का कर्ज खत्म हो जाएगा। और कांग्रेस पार्टी को 2.50 करोड़ का चंदा भी मैं दूंगा। उसके बाद केंद्रीय मंत्री के विभाग से एलआईसी को दिल्ली से फोन जाता है, फोन जाने के बाद एलआईसी बिना नियमों के पालन किए 1करोड़ 20 लाख की कंपनी को 5 करोड़ 50 लाख में खरीद लेती है। हरिदास मूंदड़ा की कंपनी का फर्जी शेयर खरीदी होने के बाद इसका खुलासा करते हुए फिरोज गांधी ने संसद में अपने ही ससुर पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरकार और कांग्रेस पार्टी पर ढाई करोड़ का चंदा लेने का आरोप लगाया । जवाहर लाल नेहरू जो उस समय के प्रधानमंत्री थे संसद में यह खुलासा होने के बाद तिलमिला गए और पूरे मामले की जांच कराने की बात कही। जांच में नेहरू मंत्रिमंडल के केंद्रीय मंत्री जांच में दोषी पाए गए और उनका इस्तीफा लिया गया। आजाद भारत के इतिहास में पंडित नेहरू की सरकार के दौरान एलआईसी का यह पहला वित्तीय घोटाला हुआ था। उस जमाने के साढ़े पांच करोड़ आज के वित्तीय स्थिति के अनुसार 9 हजार 500 करोड़ से भी ज्यादा होता। इसी बड़े घोटाले को जो संसद की कार्यवाही में अभी तक रखा गया है और विलोपित नहीं हुआ है।
दरअसल इस घोटाले में शेयर खरीदने का फैसला एआईसी का नहीं था यह फैसला ऊपर से हुआ था जिसे एआईजी ने अमलीजामा पहनाया। दिसंबर 1957 में फिरोज गांधी ने संसद में लगातार सवाल पूछे-एलआईसी ने महंगे दर पर यह शेयर क्यों खरीदे और किसके कहने पर खरीदे। संसद की बहस में फिरोज गांधी अपनी सरकार पर भारी पड़ गए, नेहरू ने जांच बिठाई और जांच का जि मा जस्टिस छागला को दिया गया। जांच रिपोर्ट में सच्चाई सामने आने के उपरांत फरवरी 1958 में उसे समय के तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री नेहरू मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सदस्य टीटी कृष्णमाचारी को तत्काल पद से हटा दिया गया तथा वित्त मंत्रालय के कर्मचारी एच एम पटेल को सर्विस से डिसमिस कर दिया गया। आजाद भारत का सबसे बड़ा और पहला बैंकिंग घोटाला नेहरू शासनकाल में हुआ था यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इस इतिहास के यादगार घोटाले को किसी व्यक्ति विशेष या संस्था से जोड़कर न देखा जाए। न ही किसी के छवि को धूमिल करने के इरादे से इसे प्रकाशित किया गया है, जो इतिहास में दर्ज प्रकरण इंटरनेट पर उपलब्ध है और संसद के लाइब्रेरी में इतिहासकारों के पन्नों में दर्ज है उसे और घोटाले की जानकारी आज की पीढ़ि को अवगत कराना भी मीडिया घरानों की नैतिक जि मेदारी भी है।
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