कोलकाता। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारतीय निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में 2026 में हुए विधानसभा चुनाव को रद्द कर पुराने मतदाता सूची के आधार पर दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। इसके साथ ही ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तत्काल गिरफ्तारी और उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग भी की है।

ममता बनर्जी का यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की एक मीडिया रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मतदाता सूची और SIR से संबंधित कुछ फैसलों पर आपत्ति जताई थी। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर विपक्ष के कई नेताओं ने चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर सवाल उठाए हैं। हालांकि निर्वाचन आयोग ने कहा है कि आंतरिक नोट्स, सुझाव और अलग-अलग विचार उसकी प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।

ममता बनर्जी ने बुधवार को फेसबुक लाइव के जरिए चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई और इससे चुनाव प्रभावित हुआ। ममता ने भाजपा और चुनाव आयोग पर मिलकर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया। हालांकि उनके इन आरोपों पर किसी अदालत या स्वतंत्र जांच एजेंसी की ओर से कोई अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

ममता बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में पुराने मतदाता सूची के आधार पर फिर से चुनाव कराया जाना चाहिए। उन्होंने यह मांग केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रखी। उनका कहना है कि जिन राज्यों में SIR के बाद चुनाव हुए और भाजपा को जीत मिली, वहां भी चुनावी प्रक्रिया की समीक्षा करते हुए दोबारा चुनाव कराया जाना चाहिए।

पूर्व मुख्यमंत्री ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए उनके इस्तीफे की भी मांग की। ममता ने कहा कि मौजूदा विवाद के बाद ज्ञानेश कुमार को पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने उनकी गिरफ्तारी और कथित गड़बड़ियों में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। ये ममता बनर्जी की राजनीतिक मांगें और आरोप हैं; किसी आपराधिक जिम्मेदारी का निर्धारण कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही होगा।

चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने विपक्ष को नया मुद्दा दे दिया है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान SIR और मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों को लेकर कई बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। तृणमूल कांग्रेस नेता अभिषेक बनर्जी ने भी इस मामले में ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और चुनाव आयोग के कामकाज की अदालत की निगरानी में जांच कराने की मांग की है।

वहीं चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों को लेकर लगाए जा रहे आरोपों के संदर्भ में कहा है कि आयोग में अलग-अलग स्तर पर विचार-विमर्श और सुझाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग के मुताबिक अंतिम निर्णय सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। ऐसे में विपक्ष के आरोपों और आयोग के स्पष्टीकरण के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

इस पूरे विवाद के बीच भाजपा ने भी विपक्ष के आरोपों पर पलटवार किया है। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के कारण भाजपा को फायदा पहुंचने के आरोपों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिन 20 विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनमें 13 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस और छह सीटों पर भाजपा की जीत हुई। भाजपा ने इसी आधार पर चुनाव में कथित हेरफेर के विपक्ष के आरोपों को चुनौती दी है।

पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग और ममता बनर्जी के बीच टकराव पहले से जारी है। हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर भी विवाद सामने आया था। चुनाव आयोग ने पार्टी में आंतरिक विवाद के बीच मूल नाम और चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके खिलाफ ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

अब SIR और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों के मामले ने राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है। ममता बनर्जी की ओर से विधानसभा चुनाव रद्द करने, पुराने मतदाता सूची से दोबारा चुनाव कराने और मुख्य चुनाव आयुक्त की गिरफ्तारी की मांग के बाद इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और तेज होने की संभावना है।

फिलहाल ममता बनर्जी की दोबारा चुनाव और गिरफ्तारी की मांग राजनीतिक मांग है। चुनाव रद्द करने या किसी अधिकारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का फैसला संबंधित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है। अब इस मामले में चुनाव आयोग की आगे की प्रतिक्रिया और किसी संभावित न्यायिक कार्रवाई पर नजर रहेगी।

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