कोलकाता। पश्चिम बंगाल में उपचुनाव और नगर निकाय चुनावों से पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अंदरूनी लड़ाई और तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल विधानसभा सचिवालय ने बागी गुट से जुड़े 10 विधायकों को नोटिस जारी कर अयोग्यता की मांग वाली याचिका पर जवाब मांगा है। इन विधायकों को सात दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाले गुट ने दल-बदल विरोधी कानून के तहत इन विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है।

विधानसभा सचिवालय की ओर से जिन विधायकों को नोटिस जारी किया गया है, उनमें विपक्ष के नेता रिताब्रता बनर्जी के साथ अरूप रॉय, फिरहाद हकीम, संदीपन साहा, अखरुज्जमां अंसारी, शिउली साहा, सबीना यास्मीन, बिप्लब मित्रा, जावेद खान और रथिन घोष शामिल हैं। विधानसभा सूत्रों के मुताबिक सभी से एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा गया है।

नोटिस मिलने की पुष्टि अखरुज्जमां अंसारी ने भी की है। उनका कहना है कि इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर चर्चा की जाएगी और तय समय के अंदर जवाब दिया जाएगा। दूसरी ओर बागी गुट विधानसभा सचिवालय के कदम को सामान्य प्रक्रिया बता रहा है।

यह पूरा विवाद TMC के भीतर नेतृत्व को लेकर चल रहे संघर्ष से जुड़ा हुआ है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने वरिष्ठ विधायक सोवनदेब चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया था। दूसरी ओर रिताब्रता बनर्जी को विधानसभा अध्यक्ष ने विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी। इसी के बाद दोनों गुटों के बीच टकराव और बढ़ गया।

सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने 7 जुलाई को विधानसभा अध्यक्ष रथिन बोस को पत्र भेजकर रिताब्रता बनर्जी समेत 10 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग की थी। ममता गुट का आरोप है कि इन विधायकों ने पार्टी के हितों के खिलाफ काम किया। अब इसी अयोग्यता याचिका पर विधानसभा सचिवालय ने संबंधित विधायकों से जवाब मांगा है।

मामला केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। चट्टोपाध्याय सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे हैं। उनकी याचिका में दल-बदल विरोधी कानून के तहत 10 विधायकों की अयोग्यता पर कार्रवाई की मांग की गई है। TMC नेता और अधिवक्ता कल्याण बनर्जी के अनुसार विधायकों की अयोग्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की गई है।

विपक्ष के नेता के पद से जुड़ा विवाद कलकत्ता हाई कोर्ट में भी पहुंच चुका है। चट्टोपाध्याय ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी है। कलकत्ता हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार जून 2026 में विधानसभा अध्यक्ष ने रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दी थी।

वहीं बागी गुट का दावा है कि उसे TMC के अधिकांश विधायकों का समर्थन हासिल है। इस गुट के मुताबिक पार्टी के 80 विधायकों में से 65 रिताब्रता बनर्जी के साथ हैं। इसके बाद बागी खेमे ने अखरुज्जमां अंसारी को चीफ व्हिप चुना और समानांतर संगठनात्मक गतिविधियां भी शुरू कीं। हालांकि यह समर्थन संख्या बागी गुट का दावा है और इसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए।

TMC का यह विवाद विधानसभा से निकलकर संसद और चुनाव आयोग तक भी पहुंच चुका है। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर दोनों गुट दावा कर रहे हैं। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को इस विवाद पर अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ जब राज्य की दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है।

ममता बनर्जी गुट का कहना है कि बागी विधायकों का आचरण दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता का आधार बनता है। इसके विपरीत रिताब्रता बनर्जी से जुड़े खेमे ने नोटिस को नियमित प्रक्रिया बताया है। बागी गुट के प्रवक्ता रिजु दत्ता का कहना है कि विधानसभा अध्यक्ष ने प्रक्रिया के तहत विधायकों से जवाब मांगा है और अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब नजर 10 विधायकों के जवाब और विधानसभा स्तर पर होने वाली अगली कार्रवाई पर रहेगी। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट, कलकत्ता हाई कोर्ट और चुनाव आयोग में चल रही अलग-अलग प्रक्रियाएं भी TMC के दोनों गुटों के बीच जारी विवाद के लिए महत्वपूर्ण होंगी। फिलहाल नोटिस जारी होना अयोग्यता का अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि संबंधित विधायकों से उनका पक्ष मांगने की औपचारिक प्रक्रिया है।

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