उत्तराखंड में परती जमीन पर होगी जंगली जड़ी-बूटियों की खेती, 5000 वन पंचायतों को जोड़ने की तैयारी
देहरादून: उत्तराखंड में अब खाली और परती पड़ी कृषि भूमि किसानों और ग्रामीणों की आय का नया साधन बनने जा रही है। राज्य सरकार ने पहली बार बड़े स्तर पर निजी भूमि को जंगली जड़ी-बूटियों की खेती से जोड़ने की पहल शुरू की है। इस योजना का उद्देश्य पहाड़ी क्षेत्रों में बेकार पड़ी जमीन का उपयोग करना और ग्रामीणों को रोजगार व स्वरोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना है।
योजना के तहत राज्य की करीब पांच हजार वन पंचायतों को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का मानना है कि जड़ी-बूटी उत्पादन को बढ़ावा मिलने से न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि उत्तराखंड की पारंपरिक वनस्पतियों को भी संरक्षण मिलेगा।
खाली जमीन का होगा बेहतर उपयोग
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में कृषि भूमि ऐसी है, जहां खेती नहीं हो रही है। पलायन और खेती में बढ़ती लागत के कारण कई खेत वर्षों से खाली पड़े हैं। अब इन जमीनों पर औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है।
जंगली जड़ी-बूटियों की खेती के जरिए किसान कम संसाधनों में भी आय प्राप्त कर सकेंगे। पहाड़ी क्षेत्रों की जलवायु कई औषधीय पौधों के लिए अनुकूल मानी जाती है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने की संभावनाएं काफी अधिक हैं।
वन पंचायतों को योजना से जोड़ने का लक्ष्य
उत्तराखंड में वन पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गांवों के आसपास के वन क्षेत्रों के संरक्षण और प्रबंधन में वन पंचायतें सक्रिय रहती हैं। अब इन्हें जड़ी-बूटी आधारित आजीविका कार्यक्रम से जोड़ने की तैयारी है।
सरकार का लक्ष्य है कि राज्य की करीब पांच हजार वन पंचायतों के माध्यम से ग्रामीणों तक इस योजना का लाभ पहुंचाया जाए। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और जंगलों पर निर्भरता भी कम हो सकती है।
निजी भूमि पर पहली बार बड़ा प्रयास
उत्तराखंड में इससे पहले जड़ी-बूटी उत्पादन को लेकर कई योजनाएं संचालित होती रही हैं, लेकिन पहली बार निजी कृषि भूमि को बड़े पैमाने पर इससे जोड़ने की पहल की जा रही है।
इस योजना के तहत किसानों को जड़ी-बूटी खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। उन्हें पौधों की जानकारी, खेती की तकनीक और बाजार से जुड़ने में सहायता उपलब्ध कराने की तैयारी है।
औषधीय पौधों की बढ़ेगी मांग
देश और दुनिया में प्राकृतिक उत्पादों और आयुर्वेदिक दवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में उत्तराखंड में जड़ी-बूटी उत्पादन को बढ़ावा मिलने से किसानों को बाजार का लाभ मिल सकता है।
राज्य में पहले से ही कई क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खेती की जाती है। अब इसे व्यापक स्तर पर बढ़ाने की योजना है, ताकि अधिक से अधिक ग्रामीण इससे जुड़ सकें।
पलायन रोकने में मदद की उम्मीद
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में रोजगार की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन करते हैं। सरकार को उम्मीद है कि जड़ी-बूटी खेती जैसी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में आय के नए स्रोत तैयार कर सकती हैं।
अगर किसानों को स्थानीय स्तर पर रोजगार और बेहतर आमदनी मिलने लगेगी तो इसका असर पलायन की समस्या पर भी पड़ सकता है।
प्रशिक्षण और बाजार व्यवस्था पर जोर
जड़ी-बूटी खेती को सफल बनाने के लिए केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि बाजार से जोड़ना भी जरूरी है। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण देने और उत्पादों की बिक्री के लिए बेहतर व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, औषधीय पौधों की खेती में सही जानकारी और वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल जरूरी होता है। इसके लिए किसानों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाएगा।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा नया आधार
उत्तराखंड में जड़ी-बूटी खेती की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। खाली पड़ी जमीन का उपयोग होने के साथ-साथ किसानों को अतिरिक्त आय का जरिया मिलेगा।
सरकार का लक्ष्य है कि इस योजना के माध्यम से पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हों और स्थानीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके। आने वाले समय में जड़ी-बूटी खेती उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों के लिए आजीविका का एक मजबूत आधार बन सकती है।