नई दिल्ली: क्या किसी करीबी सहयोगी पर लगे आरोपों की वजह से कोई बड़ा नेता अपनी ही पार्टी के अहम पद छोड़ सकता है? उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के एक फैसले ने यही सवाल खड़ा कर दिया है। रावत ने कांग्रेस में अपने दो महत्वपूर्ण पदों से हटने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि वह नहीं चाहते कि उनके करीबी सहयोगी पर लगे आरोपों की वजह से भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस की लड़ाई पर कोई असर पड़े।
दो अहम पदों से हटने का ऐलान
हरीश रावत ने सोशल मीडिया के जरिए अपने फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी सदस्य और राष्ट्रीय कांग्रेस कार्य समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य के पद से हटना चाहते हैं। रावत ने साफ किया कि वह इस समय किसी सरकारी पद पर नहीं हैं, इसलिए सरकारी पद से इस्तीफा देने का सवाल नहीं है। उनका फैसला पार्टी के भीतर उनके संगठनात्मक पदों से जुड़ा है।
उन्होंने अपने बयान में राहुल गांधी की ओर से भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का भी जिक्र किया। रावत के मुताबिक, ऐसे समय में जब पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद कर रही है, उनके करीबी व्यक्ति पर लगे आरोप पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। इसी वजह से उन्होंने दोनों पद छोड़ने का फैसला लिया है।
करीबी सहयोगी चंदन सिंह जीना पर कार्रवाई
हरीश रावत के इस फैसले का संबंध उनके पूर्व ओएसडी और करीबी सहयोगी चंदन सिंह जीना से जुड़ी प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से बताया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जीना के ठिकाने से बड़ी मात्रा में नकदी, आभूषण और अन्य कीमती सामान मिलने का दावा किया गया है। इसी के बाद मामला राजनीतिक चर्चा में आया और हरीश रावत ने अपने पार्टी पदों से हटने की घोषणा की। हालांकि रावत ने अपने सहयोगी का बचाव भी किया है। उन्होंने जीना को मेहनती, सभ्य, विनम्र और सज्जन व्यक्ति बताया। साथ ही उन्होंने कहा कि मीडिया में सामने आ रही बरामदगी और आरोपों की वास्तविक सच्चाई समय के साथ स्पष्ट होगी।
आरोप सही निकले तो क्या कहा?
हरीश रावत ने यह भी कहा कि अगर चंदन सिंह जीना पर ग्राम सेवकों की भर्ती या ओएमआर शीट में किसी तरह की छेड़छाड़ के आरोपों के पुख्ता प्रमाण सामने आते हैं, तो वह ऐसे काम के लिए शर्मिंदा होंगे।
लेकिन साथ ही उन्होंने कहा कि फिलहाल वह अपने सहयोगी पर लगाए गए इन आरोपों पर भरोसा नहीं करते। यानी एक तरफ उन्होंने आरोप साबित होने की स्थिति में गलत काम को स्वीकार नहीं करने की बात कही, वहीं दूसरी ओर मौजूदा आरोपों को लेकर उन्होंने संदेह जताया है।
चुनाव को लेकर भी किया पुराना जिक्र
अपने बयान में हरीश रावत ने एक पुराने मजाक का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब लोग उनसे पूछते थे कि चुनाव कब होंगे, तो वह मजाक में कहते थे कि जब सीबीआई उनके दरवाजे पर आएगी, तभी चुनाव होंगे।
रावत ने कहा कि इस बार उनके दरवाजे के बजाय उनके किसी सहयोगी के दरवाजे पर दस्तक दी गई है और इससे एक नई कहानी बनाने की कोशिश की जा रही है। उनके इस बयान को मौजूदा घटनाक्रम के संदर्भ में देखा जा रहा है।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी की लड़ाई का जिक्र
हरीश रावत ने अपने फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह कांग्रेस की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को बताया। उन्होंने राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई जा रही है। रावत का कहना है कि वह नहीं चाहते कि उनके कारण पार्टी की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर हो। इसलिए उन्होंने अपने दोनों संगठनात्मक पद छोड़ने का फैसला किया है।
अब सवाल यह है कि हरीश रावत के इस कदम का उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति पर क्या असर पड़ता है और चंदन सिंह जीना से जुड़े आरोपों की जांच आगे किस दिशा में जाती है। फिलहाल रावत ने अपने फैसले के जरिए पार्टी की छवि और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को प्राथमिकता देने का संदेश दिया है।