देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद मतदाताओं की संख्या को लेकर नई तस्वीर सामने आई है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के समय मौजूद मतदाता सूची की तुलना में इस बार पर्वतीय क्षेत्रों के मुकाबले मैदानी इलाकों में मतदाता सूची से दोगुने नाम हटे हैं। इस बदलाव के बाद राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या और वोटर लिस्ट में हुए संशोधन को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक और अद्यतन बनाना है। इस प्रक्रिया के दौरान ऐसे मतदाताओं के नामों की जांच की जाती है, जिनकी मृत्यु हो चुकी है, जो स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए हैं या जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हैं। इसके साथ पात्र नए मतदाताओं को सूची में शामिल करने की प्रक्रिया भी की जाती है।

उत्तराखंड में अभियान पूरा होने के बाद सामने आए आंकड़ों में पर्वतीय और मैदानी क्षेत्रों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले मैदानी क्षेत्रों में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या पर्वतीय क्षेत्रों की तुलना में लगभग दोगुनी बताई जा रही है। इससे राज्य में आबादी के आवागमन और मतदाता सूची में बदलाव की स्थिति भी सामने आती है।

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां दूसरे राज्यों से काफी अलग हैं। राज्य का एक बड़ा हिस्सा पर्वतीय है, जबकि देहरादून, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे मैदानी क्षेत्रों में आबादी का दबाव अधिक है। रोजगार, शिक्षा, कारोबार और बेहतर सुविधाओं के कारण इन क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही भी अपेक्षाकृत अधिक रहती है। ऐसे में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान मैदानी इलाकों में ज्यादा बदलाव सामने आना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मतदाता सूची से किसी व्यक्ति का नाम हटाने के कई कारण हो सकते हैं। किसी मतदाता की मृत्यु, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर जाना या एक से अधिक जगह नाम दर्ज होना इनमें शामिल हो सकता है। इसलिए सूची से हटाए गए सभी नामों को किसी एक कारण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। प्रत्येक मामले में निर्वाचन प्रक्रिया के तहत उपलब्ध रिकॉर्ड और सत्यापन महत्वपूर्ण होता है।

SIR के बाद सामने आई नई स्थिति का राजनीतिक महत्व भी है। उत्तराखंड में कुल 70 विधानसभा सीटें हैं और कई निर्वाचन क्षेत्रों में जीत-हार का अंतर सीमित रहता है। ऐसे में मतदाता सूची में होने वाला बड़ा बदलाव चुनावी गणित को भी प्रभावित कर सकता है। राजनीतिक दल मतदाता सूची में जोड़े और हटाए गए नामों का अपने स्तर पर अध्ययन कर सकते हैं।

मैदानी विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या आमतौर पर कई पर्वतीय सीटों के मुकाबले अधिक रहती है। इन इलाकों में आबादी का विस्तार और नए आवासीय क्षेत्रों का विकास लगातार हो रहा है। दूसरी तरफ रोजगार या अन्य कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने वाले मतदाताओं की संख्या भी अधिक हो सकती है। यही कारण है कि मतदाता सूची को समय-समय पर अपडेट करना निर्वाचन व्यवस्था के लिए जरूरी माना जाता है।

पर्वतीय क्षेत्रों की अपनी अलग चुनौती है। उत्तराखंड के कई पहाड़ी जिलों से रोजगार और शिक्षा के लिए लोगों के मैदानी शहरों या दूसरे राज्यों में जाने की प्रवृत्ति लंबे समय से चर्चा में रही है। इसके बावजूद पुनरीक्षण में पहाड़ों के मुकाबले मैदानी क्षेत्रों में अधिक नाम हटने का तथ्य ध्यान खींच रहा है। हालांकि इसके पीछे वास्तविक कारणों को समझने के लिए क्षेत्रवार और श्रेणीवार आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी होगा।

विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनावी व्यवस्था में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि चुनाव की निष्पक्षता काफी हद तक सही मतदाता सूची पर निर्भर करती है। सूची में मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बने रहने से सवाल खड़े हो सकते हैं। इसी तरह किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हट जाना भी गंभीर विषय है। इसलिए निर्वाचन अधिकारियों के सामने सूची की शुद्धता के साथ पात्र मतदाताओं के अधिकार की रक्षा की जिम्मेदारी रहती है।

राजनीतिक दलों और मतदाताओं के लिए भी अंतिम मतदाता सूची की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। जिन नागरिकों को अपने नाम को लेकर संदेह है, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची में अपनी स्थिति की जांच कर सकते हैं। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं है तो निर्वाचन नियमों के अनुसार नाम जुड़वाने के लिए आवेदन किया जा सकता है।

उत्तराखंड में आगामी चुनावों के लिहाज से भी मतदाता सूची में हुआ यह बदलाव महत्वपूर्ण रहेगा। मैदानी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती आबादी और लगातार हो रहे पलायन या स्थानांतरण के कारण वोटरों की संख्या में बदलाव राजनीतिक दलों की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। जिन विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में नाम हटे हैं, वहां बूथ स्तर पर मतदाता सूची की जांच और भी महत्वपूर्ण हो सकती है।

वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में मतदाता संख्या से जुड़ा मुद्दा राज्य की जनसांख्यिकीय स्थिति से भी जुड़ता है। पहाड़ों से पलायन उत्तराखंड में लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा रहा है। ऐसे में मतदाता सूची में होने वाले बदलावों का अध्ययन भविष्य में आबादी के क्षेत्रीय वितरण को समझने के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

फिलहाल SIR अभियान के बाद सामने आई तस्वीर ने यह स्पष्ट किया है कि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में उत्तराखंड की मतदाता सूची में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। सबसे ज्यादा ध्यान इस तथ्य ने खींचा है कि पर्वतीय क्षेत्रों के मुकाबले मैदानी इलाकों में करीब दोगुने मतदाताओं के नाम कटे हैं। अब अंतिम मतदाता सूची और क्षेत्रवार विस्तृत आंकड़ों के आधार पर ही यह साफ हो सकेगा कि इस बदलाव का राज्य के चुनावी समीकरणों पर कितना असर पड़ता है।

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