Haridwar हरिद्वार: देव संस्कृति विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आयोजित किए गए विशेष आदिवासी सांस्कृतिक महोत्सव ने देशभर की जनजातियों को एक मंच पर लाकर सांस्कृतिक विविधता के महत्व को प्रदर्शित किया। विश्वविद्यालय के कुलपति चिन्मय पंड्या ने बताया कि यह आयोजन हरिद्वार में इस तरह की पहली पहल हो सकती है, जिसमें देश के दूरदराज के क्षेत्रों की जनजातियां शामिल होकर अपने सांस्कृतिक विरासत को साझा कर रही हैं।
कुलपति पंड्या ने कहा, “यह महोत्सव देश की सांस्कृतिक विविधता को एकीकृत करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है। आज यहां देशभर से आदिवासी समुदायों के लोग आए हैं और हमारे साथ अपनी परंपराओं, लोक नृत्य, गीत और हस्तकला का प्रदर्शन कर रहे हैं। हजारों लोग इस आयोजन में शामिल हुए हैं और हमने पहले से निर्धारित प्रतिभागियों की संख्या पार कर दी है।”
महोत्सव के दौरान विभिन्न आदिवासी समुदायों ने अपने पारंपरिक वेशभूषा, नृत्य और संगीत का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी दर्शक भी
जनजातीय
संस्कृति के विविध पहलुओं से रूबरू हुए। विश्वविद्यालय ने विशेष रूप से यह सुनिश्चित किया कि प्रतिभागियों के लिए सुविधाएं और मंच की तैयारी पूरी तरह व्यवस्थित हो।
कुलपति पंड्या ने बताया कि आयोजन का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन ही नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, जागरूकता और समुदायिक जुड़ाव को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि युवा पीढ़ी अपने सांस्कृतिक मूल्यों और आदिवासी परंपराओं को समझे और इन्हें आगे बढ़ाए। इस तरह के आयोजनों से समाज में समानता, भाईचारा और सामाजिक एकता को भी बल मिलता है।”
महोत्सव के दौरान उपस्थित कलाकारों और प्रतिभागियों ने कहा कि इस तरह के मंच से उन्हें अपने सांस्कृतिक संरक्षण और पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिला है। उन्होंने विश्वविद्यालय और आयोजकों का धन्यवाद किया कि उन्होंने आदिवासी समाज को अपने सांस्कृतिक अनुभव साझा करने का अवसर प्रदान किया।
आयोजन में हस्तकला, चित्रकला, पारंपरिक व्यंजन और लोकगीतों की भी प्रदर्शनी लगी। इस अवसर पर स्थानीय प्रशासन और विश्वविद्यालय की टीम ने सुरक्षा, यातायात और स्वास्थ्य संबंधी सभी इंतजाम सुनिश्चित किए। महोत्सव का मुख्य आकर्षण आदिवासी नृत्य और संगीत का लाइव प्रदर्शन रहा, जिसमें दर्शकों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया।
कुलपति पंड्या ने कहा कि भविष्य में इस प्रकार के आयोजनों को और बड़े पैमाने पर आयोजित किया जाएगा, ताकि देश की सांस्कृतिक विविधता और आदिवासी विरासत को नई पीढ़ी के बीच फैलाया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय इस पहल के माध्यम से शिक्षा, संस्कृति और समाज के बीच पुल बनाने का प्रयास कर रहा है।
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