हल्द्वानी : नेपाल में करीब 11 महीने बाद एक बार फिर हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां तेज होने की खबर है। देश के सभी सात प्रांतों में हिंदू राष्ट्र की बहाली की मांग को लेकर प्रदर्शन और जनसमर्थन जुटाने की कोशिशों ने जोर पकड़ा है। इस मुद्दे ने नेपाल की राजनीति में एक बार फिर धर्मनिरपेक्षता और राजशाही पर बहस को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

सातों प्रांतों तक पहुंची मांग
हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर समर्थक देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय हो रहे हैं। राजधानी काठमांडू के अलावा प्रांतीय स्तर पर भी रैलियों और सभाओं के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश की जा रही है। समर्थकों का तर्क है कि नेपाल की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान हिंदू बहुल रही है और देश को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए।
नेपाल का धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनने का इतिहास
नेपाल लंबे समय तक हिंदू राजशाही के रूप में जाना जाता था। वर्ष 2008 में राजशाही समाप्त होने के बाद देश को संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया गया और संविधान में नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया गया। अब हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाले समूह इसी व्यवस्था में बदलाव की मांग कर रहे हैं। कुछ संगठनों की मांग हिंदू राष्ट्र के साथ-साथ राजशाही की वापसी से भी जुड़ी हुई है।
सरकार के सामने चुनौती
हिंदू राष्ट्र की मांग के बढ़ने से नेपाल की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती पैदा हो सकती है। सरकार को प्रदर्शन और राजनीतिक गतिविधियों के बीच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ अलग-अलग समुदायों के बीच सामाजिक सद्भाव भी सुनिश्चित करना होगा। नेपाल में धर्म, राजशाही और गणतांत्रिक व्यवस्था को लेकर पहले भी राजनीतिक मतभेद सामने आते रहे हैं।
आगे क्या होगा?
आने वाले दिनों में हिंदू राष्ट्र समर्थक समूहों की गतिविधियों और उनके राजनीतिक प्रभाव पर नजर रहेगी। यदि आंदोलन का विस्तार होता है तो यह नेपाल की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता, राजशाही और संविधान में संभावित बदलाव को लेकर नई बहस को जन्म दे सकता है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि हिंदू राष्ट्र की मांग कितनी व्यापक राजनीतिक ताकत में बदलती है और सरकार इस बढ़ती गतिविधि से किस तरह निपटती है।
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