उत्तराखंड से मानसून की विदाई, 96 दिन रहा सक्रिय, सामान्य से 9 फीसदी अधिक बरसे बादल
देहरादून। उत्तराखंड से दक्षिण-पश्चिम मानसून शनिवार को विदा हो गया। इसके साथ ही प्रदेश में इस साल के मानसून सीजन का औपचारिक रूप से समापन हो गया है। इस बार मानसून राज्य में कुल 96 दिनों तक सक्रिय रहा और पूरे सीजन में सामान्य से नौ फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई। मौसम विभाग के अनुसार, यह लगातार चौथा साल है जब उत्तराखंड में मानसून के दौरान सामान्य से अधिक बारिश हुई है।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य के लिए मानसून बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। खेती, पेयजल स्रोतों, नदियों और जलाशयों के लिए मानसूनी बारिश जहां जरूरी है, वहीं अत्यधिक बारिश पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, सड़क बंद होने और नदी-नालों में उफान जैसी परेशानियां भी लेकर आती है। इस बार भी मानसून के 96 दिनों के दौरान प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का प्रभाव देखने को मिला।
मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक पूरे मानसून सीजन में राज्य में औसत से नौ प्रतिशत अधिक बारिश हुई। सामान्य से ज्यादा वर्षा का यह सिलसिला लगातार चौथे साल जारी रहा। इससे साफ है कि हाल के वर्षों में उत्तराखंड में मानसून सीजन के दौरान बारिश सामान्य स्तर से ऊपर बनी हुई है।
मानसून की शुरुआत के साथ ही पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में बारिश का दौर शुरू हो जाता है। राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण एक ही समय में अलग-अलग जिलों में वर्षा की तीव्रता में काफी अंतर देखने को मिल सकता है। कहीं तेज बारिश से नदी-नाले उफान पर आ जाते हैं तो कुछ इलाकों में अपेक्षाकृत कम वर्षा दर्ज होती है। इसलिए प्रदेश स्तर के औसत आंकड़ों के साथ क्षेत्रीय परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण रहती हैं।
इस बार मानसून के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन और मलबा आने के कारण कई स्थानों पर सड़क यातायात प्रभावित होने की स्थितियां बनीं। पहाड़ों में भारी बारिश के दौरान यात्रा करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। विशेष रूप से संवेदनशील पहाड़ी मार्गों पर भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। प्रशासन और संबंधित विभागों को ऐसे समय में लगातार निगरानी रखनी पड़ती है।
मैदानी इलाकों में तेज बारिश के दौरान जलभराव और नदी-नालों का जलस्तर बढ़ना प्रमुख चुनौती रहता है। लगातार बारिश होने पर निचले इलाकों में पानी जमा होने की समस्या सामने आती है। इसी तरह नदियों के जलस्तर में अचानक वृद्धि होने से नदी किनारे रहने वाले लोगों को सतर्क रहने की जरूरत पड़ती है।
कृषि के नजरिए से मानसून का प्रदर्शन बेहद महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड के बड़ी संख्या में किसान वर्षा आधारित खेती पर निर्भर हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई के सीमित संसाधनों के कारण मानसूनी बारिश फसलों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पर्याप्त बारिश से खेतों को पानी मिलता है और प्राकृतिक जलस्रोतों को भी पुनर्भरण में मदद मिलती है।
हालांकि सामान्य से अधिक बारिश हमेशा पूरी तरह लाभकारी नहीं होती। कम समय में अत्यधिक वर्षा होने पर खेतों में पानी भरने, मिट्टी के कटाव और फसलों को नुकसान पहुंचने का खतरा भी रहता है। पहाड़ी ढलानों पर भारी वर्षा मिट्टी को कमजोर कर सकती है, जिससे भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए बारिश की कुल मात्रा के साथ उसका समय और वितरण भी महत्वपूर्ण होता है।
उत्तराखंड में लगातार चौथे साल सामान्य से अधिक मानसूनी बारिश दर्ज होना मौसम और जलवायु के अध्ययन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। मौसम वैज्ञानिक वर्षा के दीर्घकालिक पैटर्न, मानसून की सक्रियता और अलग-अलग क्षेत्रों में इसके वितरण पर लगातार नजर रखते हैं। लगातार कई वर्षों तक औसत से अधिक बारिश होने के कारणों को समझने के लिए लंबे समय के आंकड़ों का अध्ययन आवश्यक होता है।
मानसून की विदाई का मतलब यह नहीं है कि प्रदेश में अब बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। मानसून के बाद भी पश्चिमी विक्षोभ या स्थानीय मौसमी परिस्थितियों के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश हो सकती है। हालांकि दक्षिण-पश्चिम मानसून की औपचारिक वापसी के बाद मौसम के पैटर्न में धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो जाता है।
मानसून की विदाई के साथ उत्तराखंड में अब शरद ऋतु का असर बढ़ने लगेगा। पर्वतीय क्षेत्रों में सुबह और शाम के तापमान में गिरावट देखने को मिल सकती है। ऊंचाई वाले इलाकों में ठंड का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों की तुलना में जल्दी महसूस होने लगता है। आने वाले हफ्तों में न्यूनतम तापमान में धीरे-धीरे कमी आने की संभावना रहती है।
पर्यटन और चारधाम यात्रा के लिहाज से भी मानसून की विदाई महत्वपूर्ण मानी जाती है। बरसात के दौरान पहाड़ी मार्गों पर भूस्खलन और सड़क अवरोध की आशंका बनी रहती है। बारिश का दौर कमजोर पड़ने के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में यात्रा की परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सुधार होता है, हालांकि यात्रियों को मौसम और सड़क संबंधी सूचनाओं पर नजर रखना जरूरी रहता है।
इस साल 96 दिनों तक सक्रिय रहे मानसून ने उत्तराखंड को सामान्य से नौ फीसदी ज्यादा बारिश दी है। यह लगातार चौथा वर्ष है जब प्रदेश में मानसून सीजन के दौरान सामान्य से अधिक पानी बरसा। ऐसे में यह आंकड़ा मौसम वैज्ञानिकों के साथ-साथ जल संसाधन, कृषि और आपदा प्रबंधन से जुड़े विभागों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई के बाद अब इस पूरे सीजन के बारिश के आंकड़ों और उसके प्रभाव का विस्तृत आकलन किया जाएगा। लगातार चार वर्षों से सामान्य से अधिक बारिश का सिलसिला उत्तराखंड के बदलते मौसमी पैटर्न को समझने के लिए भी अहम संकेत देता है। फिलहाल मानसून के 96 दिनों के सफर के समाप्त होने के साथ प्रदेश अब बदलते मौसम और धीरे-धीरे बढ़ती ठंड की ओर बढ़ रहा है।