देहरादून। शराब की लत छुड़ाने के दौरान मरीजों को होने वाली तेज तड़प यानी क्रेविंग को कम करने के लिए अब एक नई तकनीक उम्मीद जगा रही है। देहरादून के एचआईएमएस और एसजीआरआर मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विशेषज्ञों ने शराब की लत से जूझ रहे मरीजों पर ‘ब्रेन स्टिमुलेशन’ तकनीक का सफल क्लिनिकल ट्रायल किया है। इस तकनीक को ट्रांसक्रेनियल डायरेक्ट करंट स्टिमुलेशन के नाम से जाना जाता है। इसमें मस्तिष्क के खास हिस्सों को हल्के विद्युत प्रवाह के जरिए उत्तेजित किया जाता है, जिससे शराब पीने की तीव्र इच्छा को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
शराब की लत से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे मरीजों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक क्रेविंग होती है। कई बार मरीज इलाज शुरू करने के बावजूद अचानक शराब पीने की तीव्र इच्छा महसूस करने लगते हैं। यही इच्छा उन्हें दोबारा शराब की ओर ले जाती है और उपचार की प्रक्रिया प्रभावित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस क्रेविंग को नियंत्रित किया जा सके तो नशामुक्ति की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
इसी दिशा में देहरादून के दोनों मेडिकल संस्थानों के विशेषज्ञों ने ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक का इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया में मरीज के सिर पर विशेष इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं और उनके जरिए बहुत हल्का विद्युत प्रवाह मस्तिष्क के निर्धारित हिस्सों तक पहुंचाया जाता है। यह करंट बेहद कम तीव्रता का होता है और इसका उद्देश्य मस्तिष्क की उन गतिविधियों को प्रभावित करना है जो नशे की इच्छा और निर्णय लेने की क्षमता से जुड़ी होती हैं।
क्लिनिकल ट्रायल के दौरान शराब की लत वाले मरीजों पर इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया। विशेषज्ञों ने उपचार के दौरान मरीजों में होने वाली क्रेविंग, मानसिक स्थिति और व्यवहार से जुड़े बदलावों का अध्ययन किया। शुरुआती परिणामों में तकनीक को प्रभावी पाया गया है। इससे यह उम्मीद बढ़ी है कि भविष्य में नशामुक्ति उपचार में इस तकनीक का इस्तेमाल सहायक पद्धति के रूप में किया जा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार शराब की लत केवल शारीरिक निर्भरता का मामला नहीं है। यह मस्तिष्क के रिवार्ड सिस्टम, व्यवहार और भावनात्मक स्थिति से भी जुड़ी होती है। लंबे समय तक शराब का सेवन करने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। ऐसे में जब व्यक्ति अचानक शराब छोड़ने की कोशिश करता है तो उसे बेचैनी, घबराहट, तनाव और शराब पीने की तीव्र इच्छा जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक इसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल स्तर पर काम करने का प्रयास करती है। हल्के विद्युत प्रवाह के जरिए मस्तिष्क की गतिविधियों में संतुलन लाने की कोशिश की जाती है। इससे मरीज के लिए अपनी इच्छा पर नियंत्रण रखना आसान हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञ इसे शराब की लत का अकेला इलाज नहीं मानते, बल्कि इसे दवाओं, काउंसलिंग और अन्य उपचार पद्धतियों के साथ इस्तेमाल किए जाने वाले एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
नशामुक्ति केंद्रों में वर्तमान समय में मरीजों का इलाज दवाओं, मनोवैज्ञानिक परामर्श और व्यवहार चिकित्सा के जरिए किया जाता है। कई मरीजों में यह उपचार प्रभावी रहता है, लेकिन कुछ मरीजों में बार-बार क्रेविंग की समस्या सामने आती है। ऐसे मामलों में ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक अतिरिक्त मदद दे सकती है।
इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें किसी तरह की सर्जरी की जरूरत नहीं होती। इलेक्ट्रोड सिर की त्वचा पर लगाए जाते हैं और नियंत्रित मात्रा में विद्युत प्रवाह दिया जाता है। प्रक्रिया के दौरान मरीज होश में रहता है और विशेषज्ञ उसकी स्थिति की निगरानी करते हैं। तकनीक के इस्तेमाल से पहले मरीज की चिकित्सकीय स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन भी जरूरी होता है।
क्लिनिकल ट्रायल की सफलता के बाद विशेषज्ञ अब इसके व्यापक उपयोग की संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं। भविष्य में अधिक मरीजों पर अध्ययन के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि इसका असर कितने समय तक रहता है और किन मरीजों में यह सबसे अधिक प्रभावी होती है।
शराब की लत देश में स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौतियों में से एक है। इसका असर केवल व्यक्ति के शरीर पर ही नहीं, बल्कि परिवार, सामाजिक जीवन और आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है। कई बार लोग शराब छोड़ना चाहते हैं, लेकिन क्रेविंग और वापसी के लक्षणों के कारण सफल नहीं हो पाते।
ऐसे में ब्रेन स्टिमुलेशन तकनीक का सफल ट्रायल नशामुक्ति के क्षेत्र में नई उम्मीद के रूप में देखा जा रहा है। यदि आगे के अध्ययनों में भी इसके सकारात्मक परिणाम मिलते हैं तो यह शराब की लत छुड़ाने की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण सहायक तकनीक बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी मरीज को ऐसी तकनीक का इस्तेमाल केवल प्रशिक्षित चिकित्सकों और विशेषज्ञों की निगरानी में ही कराना चाहिए। शराब की लत का इलाज व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए उपचार शुरू करने से पहले पूरी चिकित्सकीय जांच और उचित सलाह जरूरी है।
देहरादून के एचआईएमएस और एसजीआरआर मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञों द्वारा किया गया यह क्लिनिकल ट्रायल नशामुक्ति चिकित्सा में एक नए विकल्प की ओर संकेत करता है। हल्के विद्युत प्रवाह के जरिए शराब की तलब को नियंत्रित करने की यह तकनीक भविष्य में उन मरीजों के लिए मददगार साबित हो सकती है, जो बार-बार क्रेविंग के कारण शराब छोड़ने में कठिनाई महसूस करते हैं।