तमक बाढ़ के पीछे सिर्फ बारिश नहीं, खड़ी भू-आकृति और पहाड़ी मलबे ने बढ़ाई तबाही
देहरादून। तमक क्षेत्र में 10 अगस्त की शाम आई अचानक बाढ़ के पीछे केवल तेज मानसूनी बारिश को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। दून विश्वविद्यालय के नित्यानंद हिमालयन रिसर्च एंड स्टडी सेंटर के अध्ययन में सामने आया है कि क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों ने इस आपदा को और भयावह बना दिया। बेहद खड़ी भू-आकृति, धारा का असाधारण ढाल, संकरी घाटी और बड़ी मात्रा में जमा पहाड़ी मलबे ने बारिश के पानी को कुछ ही समय में विनाशकारी सैलाब में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी पहाड़ी क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति केवल बारिश की मात्रा पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वहां की भौगोलिक संरचना, जल निकासी व्यवस्था और भूमि की स्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। तमक क्षेत्र में हुई घटना को भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
दून विश्वविद्यालय के नित्यानंद हिमालयन रिसर्च एंड स्टडी सेंटर के प्रो. देवी दत्त चौनियाल के अध्ययन में बताया गया कि तमक क्षेत्र की भौगोलिक बनावट आपदा की तीव्रता बढ़ाने वाली रही। यहां पहाड़ों की ढलान काफी अधिक है, जिसके कारण बारिश का पानी सामान्य गति से बहने के बजाय तेजी से नीचे की ओर बढ़ता है।
अध्ययन के अनुसार, क्षेत्र में मौजूद संकरी घाटियों ने पानी के बहाव को सीमित कर दिया। जब कम समय में बड़ी मात्रा में पानी पहुंचा तो उसे फैलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं मिली। इसके कारण पानी का दबाव बढ़ गया और वह अपने साथ भारी मात्रा में मलबा बहाकर ले गया।
विशेषज्ञों ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में जमा मलबा अचानक आने वाली बाढ़ को और खतरनाक बना देता है। तमक क्षेत्र में भी बड़ी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और अन्य पहाड़ी सामग्री जमा थी। तेज बहाव के साथ यह मलबा आगे बढ़ा और सैलाब की विनाशकारी क्षमता कई गुना बढ़ गई।
प्रो. चौनियाल के अध्ययन में यह भी सामने आया कि क्षेत्र में धारा का ढाल असाधारण रूप से अधिक है। अधिक ढाल वाले क्षेत्रों में पानी की रफ्तार बहुत तेज हो जाती है। इससे पानी को जमीन में समाने का समय कम मिलता है और पूरा बहाव तेजी से निचले इलाकों की ओर बढ़ता है।
मानसून के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में इस तरह की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में पहले से संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं की आशंका अधिक रहती है।
तमक की घटना ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता को सामने रखा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे इलाकों में निर्माण गतिविधियों, जल निकासी व्यवस्था और मलबा प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
स्थानीय स्तर पर नदी-नालों के रास्तों की पहचान, संवेदनशील क्षेत्रों का मानचित्रण और समय रहते चेतावनी प्रणाली विकसित करना भविष्य में ऐसी आपदाओं के नुकसान को कम कर सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में विकास कार्यों के दौरान प्राकृतिक संरचना का ध्यान रखना भी बेहद जरूरी है।
प्रो. चौनियाल के अध्ययन से यह संकेत मिलता है कि केवल बारिश को आपदा का कारण मानना सही नहीं होगा। प्राकृतिक परिस्थितियों और मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को समझकर ही ऐसी घटनाओं से बचाव की बेहतर रणनीति तैयार की जा सकती है।
तमक में आई बाढ़ ने स्थानीय लोगों को भारी नुकसान पहुंचाया और क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया। अब जरूरत है कि वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर भविष्य की योजनाएं बनाई जाएं, ताकि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा हमेशा बना रहता है, लेकिन सही योजना, निगरानी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर इनके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।