ऋषिकेश: स्विट्जरलैंड की रहने वाली गंगा के लिए भारतीय संस्कृति से जुड़ाव उनके पारिवारिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। उत्तराखंड में विवाह करने वाली गंगा करीब एक दशक से करवाचौथ का व्रत रख रही हैं। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उनकी शादी वर्ष 2018 में नगर पंचायत स्वर्गाश्रम जौंक के वार्ड नंबर तीन के सभासद जितेंद्र धाकड़ से हुई थी। दोनों शादी से करीब तीन वर्ष पहले से एक-दूसरे को जानते थे। उसी दौरान गंगा की करवाचौथ में रुचि बढ़ी और उन्होंने इस परंपरा को अपनाना शुरू किया। 
विवाह से पहले शुरू हुआ परंपरा से लगाव
गंगा के मुताबिक, वह पिछले लगभग 10–11 वर्षों से पति की लंबी उम्र की कामना के साथ व्रत रख रही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी हैं। वह बच्चों को भी भारतीय संस्कृति से परिचित करा रही हैं। उनके माता-पिता टेरिसा और पीटर लोडर समय-समय पर स्विट्जरलैंड से उत्तराखंड आते हैं। परिवार का संबंध लक्ष्मणझूला-सिलोगी मोटर मार्ग के घट्टूगाड़ क्षेत्र से भी है। यह कहानी एक व्यक्ति के अपनी पसंद से दूसरी संस्कृति की परंपराओं से जुड़ने की है। जन्मस्थान और पारिवारिक पृष्ठभूमि अलग होने के बावजूद त्योहार साझा जीवन का हिस्सा बन सकते हैं। गंगा के मामले में विवाह से पहले शुरू हुई रुचि लंबे समय से निभाई जा रही परंपरा में बदल गई।
करवाचौथ में आस्था और पारिवारिक जुड़ाव
करवाचौथ उत्तर भारत के कई हिस्सों में मनाया जाता है। परंपरागत रूप से विवाहित महिलाएं जीवनसाथी के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के साथ व्रत रखती हैं। शाम को पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। यह धार्मिक आस्था से जुड़ी परंपरा है; व्रत से आयु बढ़ने को वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस पर्व की रस्में अलग-अलग परिवारों में कुछ भिन्न हो सकती हैं। कई घरों में सुबह सरगी की परंपरा रहती है, जबकि शाम को महिलाएं एकत्र होकर पूजा और कथा में शामिल होती हैं। पहनावे, पूजा की थाली और पारिवारिक रीति के अनुसार उत्सव की तैयारी की जाती है। किसी दूसरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति के लिए ऐसी परंपराओं से परिचय धीरे-धीरे बन सकता है। त्योहार का अर्थ समझना, परिवार की रीति जानना और अपनी इच्छा से उसमें भाग लेना इस अनुभव के अलग पहलू हैं। इसे सभी लोगों के लिए एक जैसी अपेक्षा बनाने के बजाय व्यक्तिगत आस्था के रूप में समझना अधिक उचित है।
ऋषिकेश में आज पूजा और चंद्रोदय का समय
वर्ष 2026 में करवाचौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। ऋषिकेश के लिए द्रिक पंचांग में पूजा का समय शाम 5 बजकर 32 मिनट से 6 बजकर 50 मिनट तक बताया गया है। चंद्रोदय का अनुमानित समय रात 8 बजकर 8 मिनट है। पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को रात 1 बजकर 6 मिनट पर शुरू होकर उसी रात 10 बजकर 9 मिनट तक रहेगी। ये समय ऋषिकेश के स्थानीय समय के अनुसार हैं। अन्य शहरों में चंद्रोदय और पूजा का समय अलग हो सकता है। पहाड़ों, बादलों या सामने मौजूद इमारतों के कारण चंद्रमा दिखाई देने में भी अंतर संभव है। 
पूजा के समय और चंद्रमा दिखाई देने के समय को अलग समझना जरूरी है। शाम की पूजा पूरी होने के बाद भी चंद्रदर्शन का इंतजार किया जाता है। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करता है और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलता है।
परंपरा निभाने के तरीके होते हैं अलग
करवाचौथ के उत्सव में किसी के लिए पूजा का विशेष महत्व होता है तो कोई इसे परिवार के साथ समय बिताने का अवसर मानता है। कई महिलाएं अपनी मां या सास से सीखी रस्में निभाती हैं। दूसरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने वाली महिला भी परिवार के साथ रहते हुए इनका अर्थ समझ सकती है। गंगा की कहानी के आधार पर उनके घर में निभाई जाने वाली हर रस्म का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। उनके पहनावे, पूजा सामग्री, भोजन या दिनचर्या का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनकी व्यक्तिगत तैयारी को सामान्य करवाचौथ परंपराओं से अलग रखते हुए समझना चाहिए।
व्यक्तिगत चुनाव से मजबूत होता सांस्कृतिक रिश्ता
गंगा का अनुभव दिखाता है कि सांस्कृतिक जुड़ाव केवल जानकारी तक सीमित नहीं रहता; वह रोजमर्रा के जीवन और पारिवारिक अवसरों में भी जगह बना सकता है। किसी परंपरा को स्वेच्छा से अपनाने में उसके प्रति व्यक्ति की रुचि और लगाव महत्वपूर्ण होते हैं। उनका करवाचौथ से संबंध इसी व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक जीवन का उदाहरण है। स्विट्जरलैंड की पृष्ठभूमि और उत्तराखंड में बसे वैवाहिक जीवन के बीच यह त्योहार उनके लिए निरंतरता का हिस्सा बना हुआ है। इसे उनकी अपनी कहानी और पसंद के रूप में देखना चाहिए, किसी अन्य महिला की आस्था या रिश्ते को परखने का मानक बनाकर नहीं।
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