देहरादून: साइबर ठगों के 'डिजिटल अरेस्ट' के जाल में फंसे 72 वर्षीय बुजुर्ग को बैंक अधिकारी की सतर्कता ने बड़ी आर्थिक ठगी का शिकार होने से बचा लिया। बुजुर्ग करीब आठ दिनों से साइबर ठगों के दबाव में थे और उनके निर्देश पर रकम ट्रांसफर करने की कोशिश कर रहे थे। बैंक अधिकारी को ग्राहक का व्यवहार संदिग्ध लगा तो उन्होंने समय रहते स्थिति को समझा और लाखों रुपये की अतिरिक्त रकम ठगों के खातों में जाने से बच गई।

मामला देहरादून का है। साइबर अपराधियों ने बुजुर्ग को फोन कर सरकारी जांच एजेंसी का डर दिखाया और कथित आपराधिक मामले में फंसने की बात कही। इसके बाद उन्हें लगातार फोन और वीडियो कॉल के जरिए दबाव में रखा गया। ठगों ने बुजुर्ग को किसी से इस बारे में बात नहीं करने की हिदायत भी दी।
बैंक पहुंचने पर अधिकारी को हुआ शक
ठगों के निर्देश पर बुजुर्ग बैंक पहुंचे। बड़ी रकम के लेनदेन की कोशिश और बुजुर्ग की घबराहट देखकर बैंक अधिकारी को शक हुआ। उन्होंने जल्दबाजी में ट्रांजेक्शन करने के बजाय बुजुर्ग से बातचीत की। पूछताछ में पता चला कि वे कई दिनों से कथित अधिकारियों के संपर्क में हैं और गिरफ्तारी सहित दूसरी कानूनी कार्रवाई के डर से रकम भेजने की तैयारी कर रहे हैं। बैंक अधिकारी ने उन्हें समझाया कि वे साइबर ठगी के जाल में फंसे हुए हैं। इसके बाद आगे होने वाला वित्तीय लेनदेन रोक दिया गया। इस सतर्कता के कारण बुजुर्ग की लाखों रुपये की अतिरिक्त रकम बच गई।
आठ दिनों से ठगों के दबाव में था बुजुर्ग
मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बुजुर्ग करीब आठ दिनों से साइबर ठगों के निर्देशों का पालन कर रहे थे। डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, साइबर क्राइम या दूसरी सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं। इसके बाद गिरफ्तारी या मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में फंसाने का भय दिखाकर पैसे ट्रांसफर करवाए जाते हैं। देहरादून में वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाकर इस तरह की साइबर ठगी के मामले पहले भी सामने आए हैं। पुलिस ने फरवरी 2026 में बताया था कि उस साल जनवरी में ही डिजिटल अरेस्ट के 18 मामले सामने आए थे और इनमें करीब 80 प्रतिशत पीड़ित वरिष्ठ नागरिक थे। इसी को देखते हुए वरिष्ठ नागरिकों को जागरूक करने के लिए अभियान भी शुरू किया गया था।
साइबर ठगों का लगातार बदल रहा तरीका
साइबर अपराधी अक्सर फोन या वीडियो कॉल पर ऐसा माहौल बनाते हैं जिससे सामने वाले व्यक्ति को लगे कि वास्तव में किसी सरकारी एजेंसी की कार्रवाई चल रही है। फर्जी दस्तावेज, वर्दी, सरकारी एजेंसियों के नाम और गिरफ्तारी की धमकी देकर पीड़ित को मानसिक दबाव में लिया जाता है।
पुलिस और साइबर सुरक्षा एजेंसियां लगातार स्पष्ट करती रही हैं कि कानूनी प्रक्रिया में 'डिजिटल अरेस्ट' नाम की कोई व्यवस्था नहीं है। संदिग्ध कॉल आने पर रकम ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए और साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत शिकायत करनी चाहिए। देहरादून का यह मामला बैंक कर्मचारियों की सतर्कता की अहमियत भी दिखाता है। बड़ी रकम के असामान्य लेनदेन के दौरान ग्राहक से बातचीत और परिस्थिति की जांच कई मामलों में साइबर ठगी को अंतिम समय पर रोक सकती है।
Tags: