पहाड़ों में घटते जलस्रोतों को मिलेगा जीवन, 4660 नौले-धारे और तालाबों के पुनर्जीवन की तैयारी
देहरादून। पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार घटते जल प्रवाह और बढ़ते पेयजल संकट की चुनौती से निपटने के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथॉरिटी (सारा) ने प्रदेशभर में ऐसे 4660 प्राकृतिक जलस्रोतों की पहचान की है, जिन्हें उपचार और पुनर्जीवन की जरूरत है।
इन जलस्रोतों में नौले, धारे, गदेरे, नदियां और तालाब शामिल हैं। इनका जल प्रवाह बनाए रखने और इन्हें दोबारा सक्रिय करने के लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जा रही है।
जलस्रोतों की घटती धार बनी चिंता
पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक जलस्रोत ग्रामीण जीवन का प्रमुख आधार रहे हैं। नौले और धारे लंबे समय से पीने के पानी की जरूरत पूरी करते आए हैं, लेकिन बदलते मौसम, कम होती बारिश, जंगलों में बदलाव और अन्य कारणों से कई जलस्रोतों का जल स्तर लगातार कम हो रहा है।
कई क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पेयजल संकट की स्थिति भी देखने को मिलती है। इसी समस्या को देखते हुए प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
4660 जलस्रोतों की हुई पहचान
स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथॉरिटी (सारा) ने प्रदेशभर में सर्वे के माध्यम से 4660 ऐसे जलस्रोत चिह्नित किए हैं, जहां उपचार की आवश्यकता है।
इनमें नौले, धारे, गदेरे, नदियां और तालाब शामिल हैं। प्रशासन का उद्देश्य इन जलस्रोतों की स्थिति का आकलन कर जरूरत के अनुसार संरक्षण कार्य करना है।
1174 जलस्रोतों में बेहद कम प्रवाह
सर्वे के दौरान सामने आया कि चिह्नित 4660 जलस्रोतों में से 1174 ऐसे हैं, जिनमें पानी का प्रवाह 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है।
इन जलस्रोतों को प्राथमिकता के आधार पर पुनर्जीवित करने की योजना बनाई जा रही है। जल प्रवाह बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से उपचार कार्य किए जाएंगे।
ग्रामीणों की भागीदारी से तैयार हुआ अभियान
जलस्रोतों के संरक्षण अभियान में ग्रामीणों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बनाया गया है। ''धारा मेरा, नौला मेरा, गांव मेरा, प्रयास मेरा'' थीम के तहत ग्रामीणों के सहयोग से जलस्रोतों की पहचान की गई।
भगीरथ एप के माध्यम से ग्रामीणों ने अपने क्षेत्रों के जलस्रोतों की जानकारी उपलब्ध कराई। इससे उन स्थानों की पहचान करने में मदद मिली जहां पानी का प्रवाह कम हो रहा है।
स्थानीय लोगों को बनाया जाएगा भागीदार
प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी मानी जा रही है।
ग्रामीणों को जलस्रोतों की देखभाल, संरक्षण और निगरानी से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है, ताकि पुनर्जीवन के बाद भी इन स्रोतों को सुरक्षित रखा जा सके।
चरणबद्ध तरीके से होगा पुनर्जीवन कार्य
सारा की ओर से चिह्नित जलस्रोतों के लिए चरणबद्ध कार्ययोजना तैयार की जा रही है। इसमें जलस्रोतों की स्थिति के अनुसार अलग-अलग संरक्षण उपाय किए जाएंगे।
इन उपायों में जल संरक्षण, कैचमेंट एरिया सुधार, वर्षा जल संचयन और आसपास के पर्यावरण को बेहतर बनाने जैसे कार्य शामिल हो सकते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण पहल
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में प्राकृतिक जलस्रोतों का महत्व काफी अधिक है। गांवों में बड़ी आबादी अब भी इन स्रोतों पर निर्भर रहती है।
जलस्रोतों के सूखने या कमजोर होने से न केवल पेयजल की समस्या बढ़ती है, बल्कि कृषि और पशुपालन पर भी असर पड़ता है।
भविष्य की जल सुरक्षा पर जोर
जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम के कारण आने वाले समय में जल संकट की चुनौती और बढ़ सकती है। ऐसे में प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण भविष्य की जल सुरक्षा के लिए जरूरी माना जा रहा है।
सारा की पहल का उद्देश्य पुराने जलस्रोतों को फिर से सक्रिय करना और पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता को मजबूत करना है।
प्रशासन की तैयारी तेज
चिह्नित जलस्रोतों की सूची तैयार होने के बाद अब प्रशासन इनके पुनर्जीवन के लिए आगे की रणनीति बना रहा है। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में जल्द कार्य शुरू करने की तैयारी है।
प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण से न केवल पेयजल संकट कम होगा, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को भी मजबूती मिलेगी। ग्रामीणों की भागीदारी के साथ यह अभियान जल संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।