उत्तराखंड SIR प्रक्रिया पर विवाद: मतदाता सूची से नाम हटाने की आपत्तियों पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
देहरादून। उत्तराखंड में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) के दौरान मतदाता सूची संशोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने फॉर्म-07 (Form-07) के माध्यम से मतदाता सूचियों से नाम हटाने को लेकर लगाई जा रही आपत्तियों पर सवाल खड़े किए हैं। पार्टी का आरोप है कि वैध मतदाताओं के नाम काटने के लिए बाहरी राज्यों—जैसे दिल्ली, बरेली और गाजियाबाद—के मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कर फर्जी और फर्जीवाड़े से आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं।
इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने राज्य निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी से निष्पक्ष जांच कराने तथा पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से न हटाने की मांग की है।
क्या है फॉर्म-07 और क्यों खड़ा हुआ विवाद?
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और निर्वाचन नियमों के तहत फॉर्म-07 का उपयोग मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति के नाम को हटाने या उस पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है। नियम के मुताबिक, यदि किसी मतदाता की मृत्यु हो गई हो, वह स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो गया हो या वह फर्जी मतदाता हो, तो उसके नाम पर फॉर्म-07 भरकर आपत्ति जताई जा सकती है।
हालांकि, उत्तराखंड कांग्रेस का दावा है कि इस संवैधानिक प्रक्रिया का गलत फायदा उठाया जा रहा है। पार्टी का कहना है कि प्रदेश के स्थानीय निवासियों के नाम हटाने के लिए ऐसे लोगों की ओर से आवेदन आ रहे हैं, जिनका उत्तराखंड से कोई संबंध ही नहीं है।
दिल्ली, बरेली और गाजियाबाद के नंबरों से दर्ज हो रहीं आपत्तियां
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि राज्य के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में फॉर्म-07 जमा करने वाले आपत्तिकर्ताओं के जब ब्योरे और संपर्क सूत्र जांचे गए, तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई।
बाहरी राज्यों के नंबर: जिन नामों से स्थानीय मतदाताओं पर आपत्तियां लगाई गई हैं, उनके साथ टैग किए गए मोबाइल नंबर दिल्ली, उत्तर प्रदेश के बरेली और गाजियाबाद जैसे दूरदराज शहरों के हैं।
संदिग्ध आपत्तिकर्ता: स्थानीय बीएलओ (Booth Level Officers) और कार्यकर्ताओं द्वारा जब उन नंबरों पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, तो या तो वे नंबर बंद मिले, या वे व्यक्ति संबंधित विधानसभा के मतदाता ही नहीं थे।
थोक में फर्जी आवेदन: कांग्रेस का कहना है कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत किया जा रहा है ताकि एक विशेष वर्ग और क्षेत्र के वैध मतदाताओं का नाम मतदाता सूची से हटाया जा सके।
कांग्रेस का आरोप: "लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर हमला"
प्रदेश कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मामले को बेहद गंभीर करार दिया है। पार्टी के प्रवक्ताओं और पदाधिकारियों का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव की भावना को ठेस पहुंचाने के लिए यह "डिजिटल गड़बड़ी" या संगठित प्रयास हो सकता है।
कांग्रेस का कहना है कि:
सत्यापन की मांग: जब तक आपत्तिकर्ता स्वयं भौतिक रूप से उपस्थित होकर अपना पहचान पत्र और उत्तराखंड का निवासी होने का प्रमाण प्रस्तुत न करे, तब तक किसी भी फॉर्म-07 पर कार्रवाई न की जाए।
सख्त कार्रवाई: फर्जी पहचान और बाहरी मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कर धोखे से फॉर्म-07 जमा करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामला (FIR) दर्ज किया जाए।
बीएलओ को स्पष्ट निर्देश: बूथ स्तर के अधिकारियों को सख्त हिदायत दी जाए कि वे बिना धरातलीय सत्यापन के किसी भी स्थानीय नागरिक का नाम मतदाता सूची से न हटाएं।
निर्वाचन आयोग और प्रशासन का रुख
इस पूरे विवाद पर राज्य निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और नियमों के तहत संचालित की जा रही है।
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, प्राप्त होने वाले सभी फॉर्म-07 की अनिवार्य रूप से बीएलओ द्वारा डोर-टू-डोर (भौतिक) जांच कराई जाती है। केवल ऑनलाइन या कागजी आपत्ति के आधार पर किसी भी वैध मतदाता का नाम नहीं काटा जा सकता। यदि कोई शिकायत या फर्जी आवेदन पाया जाता है, तो नियमानुसार उसे खारिज कर दिया जाएगा और गलत जानकारी देने वाले के खिलाफ विधिक कार्रवाई की जा सकती है।
राज्य में बढ़ी सियासी गर्माहट
उत्तराखंड में स्थानीय निकाय और आगामी चुनावों के मद्देनजर मतदाता सूची में एक-एक नाम का सही होना राजनीतिक दलों के लिए बेहद संवेदनशील विषय है। कांग्रेस द्वारा दिल्ली, गाजियाबाद और बरेली के नंबरों से लग रही आपत्तियों पर सवाल उठाने के बाद राज्य का राजनीतिक पारा चढ़ गया है। अब देखने वाली बात यह होगी कि चुनाव आयोग इस पूरे मामले में भौतिक सत्यापन के लिए क्या नए दिशा-निर्देश जारी करता है।