देहरादून। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)-2020 के तहत उत्तराखंड में प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की तैयारी तेज कर दी गई है। राज्य सरकार ने प्रदेश के सभी प्राथमिक विद्यालयों को बालवाटिका से जोड़ने का लक्ष्य तय किया है। इसके लिए शिक्षा निदेशालय स्तर पर उन विद्यालयों की मैपिंग का काम शुरू कर दिया गया है, जहां अभी बालवाटिका संचालित नहीं हो रही है। विभाग का उद्देश्य राज्य के शत-प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में बालवाटिका की सुविधा उपलब्ध कराना है, ताकि छोटे बच्चों को औपचारिक प्राथमिक शिक्षा से पहले गतिविधि आधारित और सहज तरीके से सीखने का अवसर मिल सके।

वर्तमान में उत्तराखंड में कुल 11,580 प्राथमिक विद्यालय हैं। इनमें से 5,585 विद्यालयों में बालवाटिका संचालित हो रही है। अब बाकी विद्यालयों को भी इस व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में काम शुरू किया गया है। शिक्षा विभाग की ओर से विद्यालयवार स्थिति का आकलन किया जा रहा है। मैपिंग के दौरान यह देखा जाएगा कि किन स्कूलों में बालवाटिका शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन, स्थान और अन्य व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं तथा किन विद्यालयों में अतिरिक्त तैयारियों की जरूरत होगी।

शेष विद्यालयों की होगी मैपिंग

शिक्षा निदेशालय स्तर पर शुरू की गई मैपिंग का उद्देश्य बालवाटिका से वंचित प्राथमिक विद्यालयों की पहचान करना है। इसके बाद आवश्यकता के अनुसार विद्यालयों में सुविधाएं विकसित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। विभाग की योजना है कि चरणबद्ध तरीके से सभी प्राथमिक विद्यालयों को बालवाटिका व्यवस्था के दायरे में लाया जाए।

NEP-2020 में शुरुआती वर्षों की शिक्षा को बच्चों के समग्र विकास की नींव के रूप में देखा गया है। इसी अवधारणा के तहत बालवाटिका में बच्चों को सीधे किताबों और पारंपरिक कक्षा पद्धति के बजाय खेल, गतिविधियों और अनुभवों के माध्यम से सीखने का अवसर दिया जाएगा। इससे बच्चों के स्कूल जाने के प्रति शुरुआती झिझक को कम करने और सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

तीन से आठ वर्ष के बच्चों पर फोकस

बालवाटिका में तीन से आठ वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी स्तर की शिक्षा पर जोर दिया जाएगा। इस उम्र में बच्चों के मानसिक, सामाजिक, भाषाई और संज्ञानात्मक विकास को ध्यान में रखते हुए शिक्षण गतिविधियां तैयार की जाएंगी।

बच्चों को खेल-खेल में सीखने के लिए विभिन्न गतिविधियों का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें कहानी, बातचीत, चित्र, खेल, गीत, गतिविधियां और अन्य रचनात्मक माध्यम शामिल किए जा सकते हैं। इसका मकसद बच्चों पर पढ़ाई का अनावश्यक दबाव डाले बिना उनमें सीखने की रुचि विकसित करना है।

बालवाटिका के माध्यम से बच्चों को प्राथमिक कक्षाओं में प्रवेश से पहले स्कूल के वातावरण से परिचित कराने पर भी जोर दिया जाएगा। इससे बच्चों के लिए प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत अधिक सहज बनाने में मदद मिल सकती है।

'जादू का पिटारा' से सीखेंगे बच्चे

बालवाटिका की शिक्षण व्यवस्था में 'जादू का पिटारा' और 'ई-जादू का पिटारा' जैसे संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा। इन माध्यमों के जरिए बच्चों को खेल और गतिविधियों के साथ सीखने का अवसर मिलेगा।

'जादू का पिटारा' में बच्चों की उम्र और सीखने के स्तर को ध्यान में रखते हुए विभिन्न प्रकार की गतिविधियों और शिक्षण सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं डिजिटल माध्यम से जुड़े 'ई-जादू का पिटारा' के जरिए भी बच्चों के लिए सीखने की सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी।

इन संसाधनों का इस्तेमाल बच्चों की भाषा, अभिव्यक्ति और बुनियादी संख्या ज्ञान विकसित करने के लिए किया जाएगा। बच्चों को शब्दों, ध्वनियों, कहानियों और बातचीत के माध्यम से भाषा सीखने का अवसर मिलेगा। इसी तरह संख्या संबंधी शुरुआती अवधारणाओं को गतिविधियों और खेलों के माध्यम से समझाने की कोशिश की जाएगी।

रटने के बजाय गतिविधि आधारित शिक्षा

बालवाटिका की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता गतिविधि आधारित शिक्षा होगी। छोटे बच्चों के लिए लंबे समय तक एक जगह बैठकर पढ़ना मुश्किल होता है। ऐसे में खेल और गतिविधियों को सीखने की प्रक्रिया से जोड़कर बच्चों को स्वाभाविक तरीके से शिक्षित करने की योजना है।

उदाहरण के तौर पर रंगों, आकारों और वस्तुओं की पहचान खेल के जरिए कराई जा सकती है। कहानी और बातचीत के माध्यम से बच्चों की भाषा और अभिव्यक्ति क्षमता विकसित की जा सकती है। वहीं गिनती और संख्या की शुरुआती समझ के लिए रोजमर्रा की वस्तुओं तथा खेल सामग्री का उपयोग किया जा सकता है।

इस व्यवस्था में बच्चों की केवल शैक्षणिक क्षमता ही नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता, संवाद क्षमता और सामाजिक व्यवहार को भी विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा।

प्राथमिक शिक्षा की मजबूत नींव बनाने की तैयारी

शिक्षा विभाग का मानना है कि शुरुआती वर्षों में बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उचित सीखने का वातावरण उपलब्ध कराने से आगे की पढ़ाई की नींव मजबूत की जा सकती है। इसी उद्देश्य से उत्तराखंड में बालवाटिका का विस्तार किया जा रहा है।

फिलहाल 11,580 प्राथमिक विद्यालयों में से 5,585 स्कूलों में बालवाटिका संचालित हो रही है। बाकी विद्यालयों की मैपिंग शुरू होने के बाद विभाग को राज्य में बालवाटिका के विस्तार की वास्तविक जरूरत और संसाधनों की स्थिति का विस्तृत आकलन मिल सकेगा।

शत-प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में बालवाटिका शुरू होने के बाद तीन से आठ वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक शिक्षा का एक समान ढांचा तैयार करने की दिशा में राज्य आगे बढ़ेगा। इससे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप बच्चों को शुरुआती स्तर पर खेल, गतिविधि और अनुभव आधारित शिक्षा देने की व्यवस्था को व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकेगा।

Tags: