मथुरा। रोजगार की राह हमेशा किसी दफ्तर के दरवाजे से होकर ही नहीं गुजरती। कई बार यही राह मिट्टी को आकार देने वाले कुम्हार के चाक से निकलती है तो कभी औजारों की खनक के बीच अपना रास्ता बनाती है। किसी के सपनों को कंप्यूटर की स्क्रीन रोशनी देती है तो कोई अपने हुनर और मेहनत के दम पर छोटी-सी इकाई को कारोबार में बदल देता है। मथुरा जिले के ढाई हजार से अधिक युवाओं ने रोजगार की इसी राह को चुना है। नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय इन युवाओं ने अपने हुनर को काम में बदला और काम को रोजगार का जरिया बनाया।

सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत मिले आर्थिक सहयोग ने युवाओं को अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर दिया। पिछले तीन वर्षों में जिले में बड़ी संख्या में युवाओं ने योजना का लाभ उठाकर अपना स्वरोजगार शुरू किया है। खास बात यह है कि इनमें से कई युवा अब केवल अपने लिए रोजगार नहीं कर रहे, बल्कि दूसरों को भी काम दे रहे हैं। किसी के कारोबार में दो-चार हाथ जुड़े हैं तो कुछ उद्यमियों की इकाइयों में 20 से अधिक लोग काम कर रहे हैं।

तीन वर्ष में ढाई हजार से अधिक युवाओं ने शुरू किया कारोबार

वर्ष 2024 से 2026 के बीच जिले में ढाई हजार से अधिक युवाओं ने सीएम युवा उद्यमी विकास योजना के तहत अपना रोजगार खड़ा किया है। योजना के माध्यम से युवाओं को कारोबार शुरू करने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई, जिससे उनके लिए पूंजी की सबसे बड़ी बाधा कुछ हद तक दूर हुई।

कई युवाओं ने अपनी रुचि और स्थानीय बाजार की जरूरत को समझकर व्यवसाय चुना। किसी ने पारंपरिक काम को आधुनिक तरीके से आगे बढ़ाया तो किसी ने नई तकनीक का सहारा लेकर कारोबार शुरू किया। इससे जिले में स्वरोजगार के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए हैं।

योजना से जुड़े युवाओं की कहानियां यह बताती हैं कि यदि हुनर के साथ उचित आर्थिक सहयोग मिल जाए तो नौकरी की तलाश करने वाला युवा रोजगार देने वाला भी बन सकता है।

नौकरी नहीं मिली तो खुद शुरू किया कारोबार

यमुनापार क्षेत्र में कुल्हड़ बनाने की इकाई चला रहे सतीश कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सतीश ने नौकरी के लिए काफी प्रयास किए। कई जगह आवेदन किया और रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटके, लेकिन मन मुताबिक अवसर नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने नौकरी की तलाश में समय गंवाने के बजाय खुद का कारोबार शुरू करने का फैसला किया।

सतीश ने अपने आसपास के बाजार और मथुरा आने वाले पर्यटकों की जरूरत को समझा। ब्रज क्षेत्र में बड़ी संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु आते हैं। चाय, लस्सी और अन्य पेय पदार्थों के लिए कुल्हड़ की मांग बनी रहती है। इसी जरूरत को उन्होंने कारोबार का आधार बनाया और कुल्हड़ बनाने की इकाई शुरू कर दी।

शुरुआत में कारोबार छोटा था, लेकिन धीरे-धीरे मांग बढ़ने लगी। काम का दायरा बढ़ा तो कर्मचारियों की जरूरत भी बढ़ी। आज सतीश की इकाई में 20 से अधिक लोग काम कर रहे हैं। जिस युवा को कभी नौकरी की तलाश थी, वही अब दूसरे लोगों के लिए रोजगार का जरिया बन गया है।

स्थानीय जरूरत को बनाया कारोबार का आधार

सतीश का उदाहरण यह भी बताता है कि स्वरोजगार के लिए हमेशा किसी बड़े शहर या बड़े निवेश की जरूरत नहीं होती। अपने क्षेत्र की जरूरत और बाजार की मांग को पहचानकर भी कारोबार शुरू किया जा सकता है। मथुरा में धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों के कारण कुल्हड़ जैसे पारंपरिक उत्पादों की मांग बनी रहती है।

युवाओं ने इसी तरह स्थानीय बाजार को समझकर अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी इकाइयां शुरू की हैं। योजना के माध्यम से मिले आर्थिक सहयोग से उन्हें शुरुआती निवेश जुटाने में मदद मिली। इससे युवाओं में अपने दम पर कुछ करने का भरोसा भी बढ़ा।

नौकरी मांगने वाले अब नौकरी देने वाले बने

स्वरोजगार की इन कहानियों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। जब कोई युवा अपनी इकाई शुरू करता है और कारोबार बढ़ता है तो उसके साथ अन्य लोगों के लिए भी काम के अवसर पैदा होते हैं।

छोटी इकाई में शुरुआत करने वाला उद्यमी धीरे-धीरे उत्पादन बढ़ाता है, कामगारों को जोड़ता है और बाजार का विस्तार करता है। इस तरह एक उद्यम कई परिवारों की आय का जरिया बन सकता है। मथुरा में योजना के तहत शुरू हुई इकाइयों से यही तस्वीर सामने आ रही है।

हुनर को अवसर मिला तो बदली दिशा

ढाई हजार से अधिक युवाओं का स्वरोजगार से जुड़ना जिले में रोजगार की बदलती सोच को भी दर्शाता है। पहले बड़ी संख्या में युवा सरकारी या निजी नौकरी को रोजगार का मुख्य विकल्प मानते थे। अब कई युवा अपने कौशल और रुचि के आधार पर कारोबार शुरू करने की ओर बढ़ रहे हैं।

आर्थिक सहायता मिलने से ऐसे युवाओं को अपने विचार को व्यवसाय में बदलने का अवसर मिला, जिनके सामने पूंजी की कमी सबसे बड़ी बाधा थी। किसी ने पारंपरिक हुनर को कारोबार बनाया तो किसी ने बाजार की मांग को अवसर में बदला।

रोजगार का नया चक्र तैयार कर रहे युवा

मथुरा के इन युवाओं की पहल रोजगार के एक नए चक्र को जन्म दे रही है। खुद के लिए काम शुरू करने वाला युवा जब दूसरों को रोजगार देता है तो उसका कारोबार स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति देता है। इससे आय के साथ बाजार में मांग और उत्पादन दोनों बढ़ते हैं।

सीएम युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत शुरू हुए ये उद्यम इस बात का उदाहरण हैं कि सही दिशा, मेहनत और आर्थिक सहयोग मिलने पर युवा नौकरी खोजने के बजाय रोजगार सृजित कर सकते हैं। सतीश कुमार जैसे युवाओं ने यह साबित किया है कि अवसर का इंतजार करने के बजाय अवसर पैदा किया जा सकता है।

मथुरा में ढाई हजार से अधिक युवाओं की यह यात्रा सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि बदलती सोच की तस्वीर भी है। जिन हाथों को कभी नौकरी की तलाश थी, उन्हीं हाथों ने अपने लिए काम खड़ा किया और अब दूसरे हाथों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं। यही स्वरोजगार की सबसे बड़ी सफलता मानी जा सकती है।

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