मथुरा : विजयादशमी के अवसर पर एक अनोखी धार्मिक परंपरा देखने को मिली, जहां सारस्वत ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने रावण का पुतला जलाने के बजाय उनकी विशेष पूजा-अर्चना की और आरती उतारी। मंगलवार को आयोजित इस कार्यक्रम में समुदाय के लोगों ने रावण को महान विद्वान बताते हुए उनके ज्ञान और धार्मिक योगदान को याद किया। इस दौरान 'लंकेश भक्त मंडल' के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने रावण के पुतला दहन की परंपरा का विरोध किया और कहा कि रावण केवल एक पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि महान ज्ञानी और विद्वान भी थे।
रावण का पुतला जलाने पर जताई आपत्ति
लंकेश भक्त मंडल के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने कहा कि उनका समुदाय विजयादशमी पर रावण के पुतले जलाने की परंपरा की निंदा करता है। उन्होंने दावा किया कि रावण सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से संबंधित थे और वे महान विद्वान, शिवभक्त तथा धार्मिक ग्रंथों के ज्ञाता थे।ओमवीर सारस्वत ने कहा कि रावण के व्यक्तित्व को केवल उनके गलत कार्यों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उनके ज्ञान और विद्वता को भी समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि समाज को रावण के जीवन से जुड़े विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का अध्ययन करना चाहिए।
भगवान राम के आचार्य बने थे रावण, सुनाया धार्मिक प्रसंग
ओमवीर सारस्वत ने एक धार्मिक कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान राम जब वनवास के दौरान रामेश्वरम में भगवान शिव की स्थापना कर रहे थे, तब रावण ने उनके आचार्य यानी पुरोहित की भूमिका निभाई थी।उनके अनुसार, धार्मिक अनुष्ठान पूरा होने के बाद भगवान राम ने रावण से आचार्य दक्षिणा मांगने के लिए कहा। रावण ने उत्तर दिया कि भगवान राम स्वयं वनवास में हैं, ऐसे में वे उन्हें क्या दे सकते हैं।इस पर भगवान राम ने कहा कि वे क्षत्रिय हैं और आचार्य को दक्षिणा अवश्य देंगे। इसके बाद रावण ने भगवान राम के सामने एक विशेष इच्छा व्यक्त की।
रावण ने भगवान राम से मांगी थी अनोखी दक्षिणा
ओमवीर सारस्वत के अनुसार, रावण ने भगवान राम से कहा कि जीवन और मृत्यु अनिश्चित हैं। संभव है कि उनका अंतिम समय निकट हो। ऐसे में उन्होंने दक्षिणा के रूप में यह इच्छा जताई कि जब उनकी मृत्यु का समय आए, तब भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण दोनों उनके सामने उपस्थित रहें।ओमवीर ने कहा कि विभिन्न धार्मिक कथाओं और वृत्तांतों में इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, जब रावण के जीवन के अंतिम क्षण आए, तब भगवान राम और लक्ष्मण उनके सामने उपस्थित थे।हालांकि, यह प्रसंग धार्मिक कथाओं की विभिन्न परंपराओं से जुड़ा है और इसे सभी रामायण संस्करणों में समान रूप से वर्णित नहीं किया गया है।
रावण की विद्वता का किया गुणगान
ओमवीर सारस्वत ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा कि रावण एक महान विद्वान थे और उनका समुदाय उनके पुतला दहन को उचित नहीं मानता। उन्होंने कहा कि रावण के ज्ञान, धार्मिक आस्था और विद्वता को सम्मान मिलना चाहिए।सारस्वत ब्राह्मण समुदाय के लोगों ने विजयादशमी के अवसर पर रावण की विशेष पूजा की और आरती उतारकर उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
विजयादशमी पर रावण दहन का धार्मिक महत्व
देशभर में विजयादशमी का त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान राम ने रावण का वध किया था। यह घटना अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश देती है।विजयादशमी नवरात्रि के समापन से भी जुड़ी हुई है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में रामलीला का आयोजन किया जाता है और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।हालांकि, सारस्वत ब्राह्मण समुदाय के इस आयोजन ने विजयादशमी से जुड़ी एक अलग धार्मिक मान्यता को सामने रखा है। जहां एक ओर देशभर में रावण दहन के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, वहीं इस समुदाय के लोगों ने रावण की विद्वता का सम्मान करते हुए उनकी पूजा-अर्चना की।
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