उत्तरप्रदेश : पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर साहित्यकार डॉ. अवनीश राही ने उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की। इस अवसर पर उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन से जुड़ी उस खास स्मृति को भी साझा किया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने उनकी और उनके पिता कवि अमर सिंह राही की संयुक्त कृति ‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ का लोकार्पण किया था। डॉ. राही ने इस अवसर को अपने और अपने पिता के साहित्यिक जीवन की अविस्मरणीय स्मृति बताया।

डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती ने डॉ. अवनीश राही के लिए वर्षों पुराने उस साहित्यिक और सांस्कृतिक अवसर की यादें ताजा कर दीं। ‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ के लोकार्पण समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ कवि अमर सिंह राही, डॉ. अवनीश राही और अलीगढ़ के तत्कालीन विधायक विवेक बंसल भी मौजूद रहे थे। उस अवसर की तस्वीर आज भी इस साहित्यिक आयोजन की स्मृतियों को जीवंत बनाए हुए है।

डॉ. अवनीश राही ने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों उनकी संयुक्त कृति का लोकार्पण होना उनके लिए केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि साहित्यिक जीवन का ऐसा क्षण था जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनके पिता कवि अमर सिंह राही के लिए भी यह अवसर बेहद महत्वपूर्ण रहा। पिता-पुत्र की संयुक्त साहित्यिक साधना को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री के हाथों पाठकों के सामने प्रस्तुत किए जाने का वह अवसर परिवार के लिए आज भी गौरवपूर्ण स्मृति के रूप में सुरक्षित है।

‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ की विषयवस्तु गौतम बुद्ध के जीवन और दर्शन पर केंद्रित है। कृति में गौतम बुद्ध के विचारों और जीवन-दर्शन को भारतीय काव्य परंपरा के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसमें आधुनिक अभिव्यक्ति के साथ भारतीय साहित्य और लोक परंपरा की कई पारंपरिक काव्य विधाओं को स्थान दिया गया है।

कृति में छंद, सवैया, लावनी, सोरठा, दोहा और चौपाई जैसी प्रचलित काव्य विधाओं का प्रयोग किया गया है। इसके साथ ही बहरतबील, चौबोला और राधेश्याम जैसी पारंपरिक एवं विलुप्तप्राय लोक-काव्य विधाओं को भी शामिल किया गया है। इस तरह ‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ केवल गौतम बुद्ध के जीवन-दर्शन को प्रस्तुत करने वाली कृति नहीं है, बल्कि भारतीय लोक-काव्य परंपरा की विविधता को भी सामने लाती है।

पारंपरिक काव्य विधाओं का प्रयोग इस कृति को विशेष बनाता है। भारतीय साहित्य में दोहा, चौपाई, सवैया और सोरठा जैसी विधाओं की समृद्ध परंपरा रही है। वहीं कई लोक-काव्य शैलियां समय के साथ साहित्य की मुख्यधारा से दूर होती गई हैं। ‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ में ऐसी विधाओं को स्थान देकर उन्हें साहित्यिक अभिव्यक्ति से जोड़ने का प्रयास किया गया है।

डॉ. अवनीश राही और उनके पिता कवि अमर सिंह राही की इस संयुक्त कृति में साहित्य और लोक परंपरा का मेल दिखाई देता है। गौतम बुद्ध के जीवन-दर्शन जैसे गंभीर विषय को अलग-अलग काव्य शैलियों के माध्यम से प्रस्तुत करना इस पुस्तक की प्रमुख विशेषताओं में शामिल है। विभिन्न छंदों और लोक-काव्य रूपों के माध्यम से बुद्ध के विचारों को पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश की गई है।

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों इस कृति का लोकार्पण होने से इससे जुड़ी स्मृति डॉ. राही के लिए और विशेष हो गई। जयंती के अवसर पर उन्होंने उसी पल को याद करते हुए कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों कृति का लोकार्पण उनके और उनके पिता के साहित्यिक जीवन की अविस्मरणीय स्मृति है।

लोकार्पण समारोह की तस्वीर भी उस दौर की याद दिलाती है। तस्वीर में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ साहित्य और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोग दिखाई देते हैं। डॉ. अवनीश राही के अनुसार यह तस्वीर आज भी उस साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन की स्मृति को जीवंत करती है।

डॉ. राही ने जयंती पर पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके साथ जुड़े इस साहित्यिक प्रसंग को कृतज्ञतापूर्वक याद किया। उनके लिए यह स्मृति इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें उनके पिता की साहित्यिक साधना और दोनों की संयुक्त कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय शामिल है।

‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ के माध्यम से जहां गौतम बुद्ध के जीवन-दर्शन को साहित्यिक रूप दिया गया, वहीं भारतीय काव्य और लोक परंपरा की अनेक विधाओं को भी एक साथ स्थान मिला। पुस्तक में शामिल पारंपरिक और विलुप्तप्राय काव्य शैलियां भारतीय साहित्य की विविधता को सामने लाती हैं।

डॉ. मनमोहन सिंह की जयंती पर डॉ. अवनीश राही की ओर से साझा की गई यह स्मृति साहित्य और सार्वजनिक जीवन के बीच बने उस संबंध को भी याद करती है, जब उनकी और कवि अमर सिंह राही की संयुक्त साहित्यिक कृति का लोकार्पण तत्कालीन प्रधानमंत्री के हाथों हुआ था। वर्षों बाद भी वह अवसर उनके साहित्यिक जीवन की यादगार स्मृतियों में शामिल है।

डॉ. राही ने पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वह उस ऐतिहासिक क्षण को कृतज्ञतापूर्वक याद करते हैं। उनके अनुसार डॉ. मनमोहन सिंह के हाथों ‘बुद्ध ज्ञान महासागर’ का लोकार्पण उनके और उनके पिता के साहित्यिक जीवन का ऐसा अध्याय है, जिसकी स्मृति हमेशा उनके साथ रहेगी।

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