वाराणसी। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने बुधवार को कहा कि भारत की भाषाई विविधता देश की बड़ी ताकत है और आधुनिक तकनीक, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित ट्रांसलेशन टूल्स, अलग-अलग भारतीय भाषाओं के बीच संवाद को और आसान बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि तकनीक का उपयोग इस तरह किया जाना चाहिए कि देश की सभी भाषाओं को आगे बढ़ने और एक-दूसरे से जुड़ने का अवसर मिले। हरिवंश वर्तमान में लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए राज्यसभा के उपसभापति हैं।
हरिवंश वाराणसी स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) यानी IIT-BHU में आयोजित ‘हिंदी माह 2026’ के मुख्य कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने “हिंदी: अखबारों के पन्नों से संसद के गलियारों तक” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के विकास, लोकतंत्र में भाषा की भूमिका, पत्रकारों की सामाजिक जिम्मेदारी और भारतीय भाषाओं के बीच मजबूत संबंध बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविध भाषाओं और संस्कृतियों से बनती है। अलग-अलग क्षेत्रों में बोली जाने वाली भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर स्थानीय इतिहास, संस्कृति, ज्ञान और परंपराओं की विरासत भी मौजूद है। ऐसे में किसी एक भाषा के विकास को दूसरी भाषा के मुकाबले के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सभी भारतीय भाषाएं मिलकर देश की सांस्कृतिक ताकत को मजबूत करती हैं।
हरिवंश ने तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल का उल्लेख करते हुए कहा कि AI आधारित अनुवाद प्रणाली भाषाई दूरी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। वर्तमान में केंद्र सरकार के स्तर पर BHASHINI और अन्य डिजिटल भाषा तकनीकों के जरिए भारतीय भाषाओं में मशीन ट्रांसलेशन, स्पीच रिकग्निशन, टेक्स्ट-टू-स्पीच और ट्रांसलिटरेशन जैसी सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। संसद में भी अलग-अलग भारतीय भाषाओं के लिए AI आधारित ट्रांसक्रिप्शन और एक साथ अनुवाद जैसी तकनीकों का परीक्षण किया जा चुका है।
उन्होंने कहा कि तकनीक का फायदा तभी वास्तविक अर्थों में मिलेगा, जब वह लोगों को उनकी अपनी भाषा में सूचना और ज्ञान तक पहुंच उपलब्ध कराए। गांवों, छोटे शहरों और अलग-अलग भाषा बोलने वाले लोगों के लिए डिजिटल माध्यम तभी ज्यादा उपयोगी होगा, जब वे अपनी भाषा में उसका इस्तेमाल कर सकें। AI आधारित अनुवाद इस दिशा में नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
IIT-BHU भी भारतीय भाषाओं से संबंधित मशीन ट्रांसलेशन और भाषा तकनीक पर काम करता रहा है। संस्थान के कंप्यूटर साइंस विभाग की प्रयोगशाला में भोजपुरी, मैथिली और मगही जैसी पूर्वांचल की भाषाओं के लिए हिंदी से मशीन ट्रांसलेशन सिस्टम विकसित करने पर काम किया गया है। इसके अलावा भाषा पहचान, ट्रांसलिटरेशन और प्राकृतिक भाषा से जुड़ी विभिन्न तकनीकों पर भी शोध किया जा रहा है।
हिंदी पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए हरिवंश ने कहा कि पत्रकारिता की मूल जिम्मेदारी समाज में जागरूकता पैदा करना और आम लोगों तक महत्वपूर्ण जानकारी सरल भाषा में पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता सिर्फ खबर देने तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक समाज में लोगों को मुद्दों को समझने, उन पर विचार करने और अपनी राय बनाने के लिए जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी निभाती है।
उन्होंने अपने पत्रकारिता के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि अखबारों की भाषा ऐसी होनी चाहिए, जिसे समाज का सामान्य व्यक्ति आसानी से समझ सके। जटिल विषयों को सरल शब्दों में लोगों तक पहुंचाना पत्रकारिता की एक बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि खबरों में विश्वसनीयता, तथ्य और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
हरिवंश का पत्रकारिता से लंबे समय तक जुड़ाव रहा है। संसदीय रिकॉर्ड में भी उनके पत्रकारिता और सार्वजनिक विमर्श के अनुभव का उल्लेख किया गया है। उन्हें हिंदी पत्रकारिता में योगदान के लिए विभिन्न सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चुका है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के समाचार पत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पत्रकारों और संपादकों ने सामाजिक सुधार, शिक्षा, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े विषयों को आम जनता तक पहुंचाया। आज डिजिटल युग में पत्रकारिता के माध्यम बदल गए हैं, लेकिन उसकी सामाजिक जिम्मेदारी कम नहीं हुई है।
हरिवंश ने संसद में भारतीय भाषाओं के प्रयोग का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों से चुने गए जनप्रतिनिधि विभिन्न भाषाओं में अपनी बात रखते हैं। ऐसी स्थिति में तकनीकी अनुवाद व्यवस्था संसदीय चर्चा को अधिक सुलभ बनाने में सहायता कर सकती है। संसद पहले से कई भाषाओं में कार्यवाही और संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने के लिए तकनीकी प्रयोग कर रही है।
उन्होंने युवाओं से हिंदी के साथ-साथ दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्य, पत्रकारिता और ज्ञान परंपराओं से परिचित होने का आग्रह किया। उनका कहना था कि नई पीढ़ी को तकनीक का उपयोग अपनी भाषाओं को कमजोर करने के बजाय उन्हें नई दुनिया से जोड़ने के लिए करना चाहिए।
IIT-BHU में सितंबर के दौरान हिंदी माह के तहत कई गतिविधियां आयोजित की गई हैं। संस्थान के राजभाषा प्रकोष्ठ की ओर से हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के साथ तकनीक, इंटरनेट और मशीन अनुवाद के जरिए हिंदी में काम को अधिक आसान बनाने पर भी जोर दिया जाता रहा है। संस्थान का राजभाषा प्रकोष्ठ यूनिकोड, मशीन अनुवाद और डिजिटल तकनीकों को हिंदी के विस्तार के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में देखता है।
हरिवंश ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय भाषाओं का भविष्य केवल सरकारी प्रयासों से तय नहीं होगा। शिक्षा संस्थानों, मीडिया, तकनीकी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और आम लोगों को भी भाषाओं के संरक्षण और विकास में भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि जब तकनीक भारतीय भाषाओं से जुड़ेगी तो ज्ञान की पहुंच भी अधिक व्यापक होगी।
उन्होंने पत्रकारिता के छात्रों और युवाओं को समाज से जुड़े मुद्दों को समझने, तथ्यों की जांच करने और सरल भाषा में लोगों के सामने रखने की सलाह दी। उनके मुताबिक जिम्मेदार पत्रकारिता राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
कार्यक्रम में भाषा, तकनीक और पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर चर्चा के साथ यह संदेश प्रमुखता से सामने आया कि डिजिटल और AI के दौर में भारतीय भाषाओं के सामने नई चुनौतियों के साथ बड़े अवसर भी मौजूद हैं। हरिवंश ने कहा कि भाषाई विविधता को बनाए रखते हुए आधुनिक तकनीक से जोड़ना आने वाले समय में भारत की ज्ञान और संवाद व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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