लखनऊ : इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश की सरकारी सेवा में कार्यरत महिला कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पहला मातृत्व अवकाश लेने के दो वर्ष के भीतर दूसरी बार मातृत्व अवकाश मांगने पर कोई वैधानिक रोक नहीं है। केवल वित्तीय हस्तपुस्तिका में दिए गए अंतराल संबंधी प्रावधान के आधार पर महिला कर्मचारी को यह लाभ देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान में कार्यरत सीमा की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने 20 जुलाई 2026 के उस विभागीय आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता का दूसरी बार मातृत्व अवकाश का आवेदन खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 17 जून 2026 से 13 दिसंबर 2026 तक 180 दिनों का मातृत्व अवकाश तत्काल स्वीकृत किया जाए। इसके साथ ही अदालत ने इस अवधि से संबंधित सभी परिणामी सेवा लाभ भी महिला कर्मचारी को देने का आदेश दिया है।
मामले के अनुसार, सुलतानपुर रोड स्थित कल्याण सिंह कैंसर संस्थान में कार्यरत सीमा ने अपनी दूसरी गर्भावस्था के लिए 17 जून से 13 दिसंबर तक मातृत्व अवकाश मांगा था। विभाग ने उत्तर प्रदेश वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियम 153(1) का उल्लेख करते हुए उनका आवेदन खारिज कर दिया। विभाग का तर्क था कि पहले और दूसरे मातृत्व अवकाश के बीच निर्धारित दो वर्ष का अंतर पूरा नहीं हुआ है, इसलिए कर्मचारी को दूसरी बार छुट्टी नहीं दी जा सकती।
विभागीय आदेश से असंतुष्ट महिला कर्मचारी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में रिट याचिका दाखिल की। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रशांत देव सिंह ने पक्ष रखते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के प्रावधानों को अपने कर्मचारियों के लिए स्वीकार किया है। ऐसे में संसद से पारित वैधानिक कानून के विपरीत वित्तीय हस्तपुस्तिका में दिए गए कार्यकारी निर्देश प्रभावी नहीं हो सकते।
याचिकाकर्ता की तरफ से अनुपम यादव, अंशु रानी और सताक्षी मिश्रा से जुड़े मामलों में हाईकोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए फैसलों का भी उल्लेख किया गया। दलील दी गई कि इन निर्णयों में अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि मातृत्व लाभ किसी प्रशासनिक सुविधा के बजाय कानून से मिला अधिकार है। इसे किसी विभागीय नियम अथवा कार्यकारी निर्देश के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद माना कि वित्तीय हस्तपुस्तिका में शामिल संबंधित प्रावधान कार्यकारी निर्देश की प्रकृति का है, जबकि मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 एक वैधानिक कानून है। यदि दोनों के प्रावधानों में किसी तरह की असंगति आती है तो वैधानिक कानून को ही प्राथमिकता दी जाएगी।
पीठ ने कहा कि मातृत्व लाभ अधिनियम में ऐसी कोई शर्त नहीं दी गई है कि पहली और दूसरी गर्भावस्था के मातृत्व अवकाश के बीच कम से कम दो वर्ष का अंतर होना आवश्यक है। इसलिए वित्तीय हस्तपुस्तिका के नियम का सहारा लेकर दूसरी बार मातृत्व अवकाश देने से इनकार करना कानूनी रूप से उचित नहीं है।
यह फैसला उत्तर प्रदेश में कार्यरत उन महिला कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिन्हें पहले मातृत्व अवकाश के दो वर्ष के भीतर दूसरी गर्भावस्था होने के कारण छुट्टी देने से मना कर दिया जाता है। हालांकि प्रत्येक मामले में कर्मचारी की सेवा शर्तें, बच्चों की संख्या और लागू वैधानिक प्रावधान भी देखे जाएंगे।
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