अंबेडकरनगर/कठुआ। जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में सीआईएसएफ कैंप के भीतर हुई फायरिंग में जान गंवाने वाले असिस्टेंट कमांडेंट अंकित कुमार पांडेय का प्रमोशन हो चुका था। उन्हें जल्द ही दिल्ली स्थित मुख्यालय बुलाकर प्रमोशन लेटर सौंपा जाना था। परिवार और परिचितों के अनुसार उनके वेतनमान में भी डिप्टी कमांडेंट ग्रेड के अनुरूप बदलाव हो चुका था। प्रमोशन के बाद उनके कंधे पर तीन सितारों की जगह अशोक स्तंभ सजने वाला था, लेकिन उससे पहले ही हुई फायरिंग ने परिवार की खुशियों को मातम में बदल दिया।

अंकित पांडेय सीआईएसएफ में डॉक्टर कमांडेंट के रूप में सेवाएं दे रहे थे। जानकारी के अनुसार उनकी पहली पोस्टिंग पुणे में हुई थी। वहीं रहते हुए उन्होंने विभागीय परीक्षा पास की और अधिकारी पद तक पहुंचे। उनके करियर में लगातार प्रगति हो रही थी और हाल ही में उनका प्रमोशन भी तय हो गया था। परिवार को उम्मीद थी कि जल्द ही वह नई जिम्मेदारी संभालेंगे।

बीते जनवरी में उनका स्थानांतरण जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में हुआ था। वहां वे सेवा-2 जलविद्युत परियोजना की सुरक्षा में तैनात सीआईएसएफ यूनिट का हिस्सा थे। 29 सितंबर की शाम कैंप में एक जवान द्वारा की गई फायरिंग में अंकित पांडेय समेत चार सीआईएसएफ कर्मियों की मौत हो गई। मृतकों में असिस्टेंट कमांडेंट अंकित कुमार पांडेय, सब-इंस्पेक्टर लक्ष्मण सिंह और दो कांस्टेबल शामिल थे। आरोपी जवान को बाद में हिरासत में ले लिया गया और घटना की जांच शुरू की गई।

घटना के बाद सीआईएसएफ ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी के आदेश भी दिए हैं। शुरुआती पुलिस जांच में सामने आया कि कैंप में किसी बात को लेकर विवाद हुआ था, जिसके बाद फायरिंग की घटना हुई। हालांकि घटना के पूरे कारण और क्रम की जांच अभी जारी है और अधिकारियों की ओर से अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है।

अंकित पांडेय उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के रहने वाले थे। उनका पैतृक गांव इब्राहिमपुर क्षेत्र के दौलतपुर एकसरा का मठिया बताया गया है। परिवार में वे छह बहनों के बीच इकलौते भाई थे। उनकी मौत की खबर गांव पहुंचते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई। ग्रामीणों और रिश्तेदारों ने उन्हें परिवार का सहारा और बेहद मेहनती अधिकारी बताया।

अंकित ने 2016 में सीआईएसएफ में दारोगा के पद पर सेवा शुरू की थी। अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर उन्होंने आगे की परीक्षाएं पास कीं और अधिकारी पद तक पहुंचे। विभागीय करियर में लगातार आगे बढ़ते हुए अब वे डिप्टी कमांडेंट स्तर की जिम्मेदारी संभालने वाले थे। यही वजह है कि परिवार के लिए उनकी अचानक मौत और भी बड़ा सदमा बनकर सामने आई है।

परिजनों के अनुसार, प्रमोशन के बाद उन्हें दिल्ली मुख्यालय बुलाया जाना था। वहां औपचारिक रूप से प्रमोशन लेटर सौंपे जाने की तैयारी थी। उनके वेतन में भी नए ग्रेड के अनुसार बदलाव हो चुका था। परिवार इस उपलब्धि से खुश था और नई जिम्मेदारी संभालने का इंतजार कर रहा था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

अंकित की शादी वर्ष 2019 में प्रियंका से हुई थी। परिवार में उनका एक छोटा बेटा भी है। घटना के बाद पत्नी और परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। गांव में अंतिम विदाई के दौरान बड़ी संख्या में लोग जुटे और उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम श्रद्धांजलि दी गई। प्रयागराज से पहुंचे सीआईएसएफ के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अंतिम सलामी दी।

अंकित पांडेय की मौत ने परिवार के साथ-साथ सीआईएसएफ में भी गहरा शोक पैदा किया है। वे न केवल एक अधिकारी थे, बल्कि डॉक्टर के तौर पर भी जिम्मेदारी निभा रहे थे। सहकर्मियों के मुताबिक वे अनुशासन और ड्यूटी को लेकर गंभीर रहते थे और अपने व्यवहार के कारण सहयोगियों के बीच सम्मानित थे।

कठुआ की घटना ने सुरक्षा बलों के कैंपों में आंतरिक अनुशासन और तनाव प्रबंधन को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि घटना के वास्तविक कारण जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे। आरोपी जवान से पूछताछ के साथ-साथ उस समय कैंप में मौजूद अन्य कर्मियों के बयान भी दर्ज किए जा रहे हैं।

सीआईएसएफ मुख्यालय घटना से जुड़े हर पहलू की जांच कर रहा है। हथियार कैसे इस्तेमाल हुआ, विवाद किस बात से शुरू हुआ और स्थिति इतनी गंभीर कैसे हुई, इन सभी सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। जांच में जिम्मेदारी तय होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अंकित पांडेय का पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक गांव पहुंचा तो हजारों आंखें नम थीं। परिवार जिस बेटे के प्रमोशन की खुशियां मनाने की तैयारी कर रहा था, उसी बेटे को अंतिम विदाई देनी पड़ी। गांव के लोगों के लिए यह सदमा इसलिए भी गहरा है क्योंकि अंकित ने साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अपनी मेहनत से सीआईएसएफ में अधिकारी पद हासिल किया था।

उनका प्रमोशन परिवार के लिए गर्व का बड़ा अवसर बनने वाला था। जल्द ही उनके कंधे पर नए पद की पहचान सजनी थी, लेकिन उससे पहले ही कठुआ में हुई फायरिंग ने उनकी जिंदगी छीन ली। अब परिवार के पास उनकी उपलब्धियों, सेवा और अधूरे सपनों की यादें ही रह गई हैं।

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