गोरखपुर :  गोरखपुर में पतंग के धारदार मांझे की चपेट में आने से रमेश की मौत हो गई। दोपहिया वाहन से जा रहे रमेश की गर्दन में मांझा उलझ गया और वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी मौत के बाद परिवार के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है। रमेश की नौ साल की बेटी और पांच साल के बेटे ने पिता को खो दिया है। घटना ने सड़क पर गुजरने वाले लोगों के लिए खतरनाक मांझे से पैदा होने वाले जोखिम को फिर सामने ला दिया है।
सामने आई जानकारी के मुताबिक, हादसा शनिवार को गोरखपुर के तिवारीपुर थाना क्षेत्र में इलाहीबाग स्थित हार्बर्ट बांध पर हुआ। मृतक की पहचान 40 वर्षीय रमेश कनौजिया के रूप में बताई गई है। रास्ते से गुजरते समय अचानक धारदार मांझा उनकी गर्दन में फंस गया। इससे गर्दन पर गंभीर चोट आई और अत्यधिक रक्तस्राव हुआ। घटना के संबंध में चाइनीज मांझे का उल्लेख सामने आया है। हालांकि, मांझे की सामग्री और उसके स्रोत की पुष्टि का अलग विवरण उपलब्ध नहीं है। 
रमेश की मौत इस घटना का सबसे दुखद पहलू है। उनके दो छोटे बच्चे अब पिता के स्नेह और साथ से वंचित हो गए हैं। नौ साल की बेटी और पांच साल के बेटे की उम्र अभी ऐसी है, जब परिवार का सहारा उनकी रोजमर्रा की जिंदगी में महत्वपूर्ण होता है। बच्चों की पढ़ाई, देखभाल और परिवार की आर्थिक स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन विषयों पर कोई निश्चित दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन पिता की अचानक मृत्यु परिवार के लिए गहरी व्यक्तिगत क्षति है।
इस हादसे से जुड़ी खबरों में रमेश के वाहन और यात्रा के उद्देश्य को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं। कहीं मोटरसाइकिल से गुजरने का उल्लेख है, जबकि दूसरे विवरण में दुकान जाने की बात कही गई है। घटना का मूल तथ्य उनकी गर्दन में मांझा उलझने और मौत होने से संबंधित है। ऐसे में वाहन के प्रकार अथवा वह कहां जा रहे थे, इस बारे में स्पष्ट पुष्टि के बिना किसी एक विवरण को अंतिम तथ्य बताना उचित नहीं होगा। 
गोरखपुर में
मांझे
की चपेट में आने की यह पहली घटना नहीं है। सितंबर में हार्बर्ट बांध फोरलेन पर 19 वर्षीय बीबीए छात्र हर्ष निगम घायल हुए थे। कॉलेज से घर लौटते समय मांझा उनके हेलमेट में फंस गया था। इससे उनका जबड़ा कट गया और वह सड़क पर गिर पड़े। आसपास मौजूद राहगीरों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया। उपचार के दौरान उनके जबड़े पर 12 टांके लगाए गए। यह पुरानी घटना है और इसका रमेश के हादसे से अलग संबंध है, लेकिन दोनों में सड़क पर मांझे का खतरा सामने आता है। 
हर्ष निगम सूरजकुंड स्थित सुभाष चंद्र बोस नगर कॉलोनी के निवासी बताए गए थे और गीडा के आईटीएम कॉलेज में पढ़ते थे। उनके घायल होने के बाद परिवार और स्थानीय लोगों ने प्रतिबंधित मांझे की बिक्री तथा इस्तेमाल पर प्रभावी रोक की मांग की थी। उस घटना में चिंता का विषय यह था कि सड़क पर सामान्य रूप से यात्रा कर रहा छात्र अचानक घायल हो गया। मांझा इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति और उसकी चपेट में आने वाला राहगीर अलग-अलग स्थानों पर हो सकते हैं, जिससे खतरे का अंदाजा समय रहते लगाना कठिन हो जाता है। 
अगस्त में भी हार्बर्ट बांध से गुजर रहे कारोबारी मनोज कुमार बरनवाल की गर्दन मांझे से कटने की घटना सामने आई थी। परिजन उन्हें अस्पताल ले गए थे, जहां उपचार के दौरान टांके लगाए गए। उसी समय गोरखनाथ थाने के सामने स्कूटी से गुजर रहे राजेश मणि भी मांझे की चपेट में आने से बाल-बाल बचे थे। राहगीरों ने उन्हें सचेत किया और मांझा हटाया गया। इन घटनाओं के बाद पुलिस ने पतंग और मांझा बेचने वाली दुकानों की जांच की थी। 
उस अभियान के दौरान दुकानदारों को प्रतिबंधित मांझा नहीं बेचने की चेतावनी दी गई थी। पुलिस ने राहगीरों को जागरूक करने के लिए पंपलेट भी बांटे थे। लोगों से खतरनाक मांझे का इस्तेमाल न करने और इसकी बिक्री की जानकारी मिलने पर पुलिस को सूचित करने की अपील की गई थी। यह कार्रवाई अगस्त की घटनाओं के बाद हुई थी। रमेश की मौत के बाद किसी नई गिरफ्तारी, दुकान पर छापेमारी या विशेष अभियान की पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। 
बार-बार सामने आ रहे हादसे दिखाते हैं कि सड़क सुरक्षा का सवाल केवल वाहनों की गति और यातायात नियमों तक सीमित नहीं है। रास्ते में फैला धारदार मांझा भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे धागे को देखकर उसे हाथ से खींचने या चलते वाहन से हटाने की कोशिश करने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाना जरूरी है। पतंग उड़ाने वालों को भी आसपास की सड़कों, राहगीरों और बिजली की तारों का ध्यान रखना चाहिए। इस्तेमाल के बाद बचा धागा खुले स्थान पर छोड़ना दूसरे लोगों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।
रमेश की मौत के बाद सबसे बड़ा नुकसान उनके परिवार और बच्चों का है। किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी, मांझे की बिक्री के स्रोत और घटना की परिस्थितियों के बारे में निष्कर्ष जांच से ही स्पष्ट होंगे। फिलहाल पुष्ट जानकारी यही है कि मांझे से गर्दन पर गंभीर चोट लगने के बाद रमेश की जान चली गई और उनके दो छोटे बच्चों ने पिता खो दिया। पुराने हादसों की पृष्ठभूमि में यह घटना खतरनाक मांझे से राहगीरों की सुरक्षा के सवाल को एक बार फिर सामने रखती है।
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