लखनऊ। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में कथित भ्रष्टाचार का एक गंभीर मामला सामने आया है। प्रदेश के उन्नाव, कानपुर नगर और लखनऊ जिलों में पहले से सील किए गए अस्पतालों को नए नाम से दोबारा संचालित कराने के बदले रिश्वत मांगने के आरोपों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले से जुड़ा एक कथित वीडियो भी सामने आया है, जिसमें अस्पतालों के पंजीकरण और संचालन से संबंधित बातचीत होने का दावा किया गया है। मामला सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव को पूरे प्रकरण की गंभीरता से जांच कराने और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों पर आरोप है कि वे पहले से सील किए गए अस्पतालों को दोबारा खोलने के लिए उनके नाम बदलकर नए सिरे से पंजीकरण कराने का रास्ता बता रहे थे। इसके बदले कथित तौर पर मोटी रकम की मांग की जा रही थी। इस संबंध में सामने आए वीडियो और मीडिया रिपोर्टों के बाद मामला चर्चा में आ गया। हालांकि, वीडियो में दिखाई गई बातचीत और रिश्वत संबंधी आरोपों की आधिकारिक जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
बताया जा रहा है कि जिन अस्पतालों को पहले विभिन्न अनियमितताओं और शिकायतों के चलते सील किया गया था, उन्हें नए नाम और नए पंजीकरण के जरिए दोबारा संचालित कराने की कोशिशों से जुड़ी जानकारी सामने आई है। आरोप है कि इस प्रक्रिया में विभागीय स्तर पर कुछ लोगों की भूमिका संदिग्ध हो सकती है। यदि जांच में ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह अस्पतालों के पंजीकरण और निगरानी व्यवस्था में गंभीर खामी को उजागर करेगा।
इस पूरे मामले का संज्ञान लेते हुए डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार या नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि मरीजों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
तीन सदस्यीय टीम करेगी पूरे मामले की जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य महानिदेशालय स्तर पर तीन सदस्यीय जांच टीम गठित करने के निर्देश दिए गए हैं। यह टीम उन्नाव, कानपुर नगर और लखनऊ से जुड़े आरोपों की जांच करेगी। इसमें अस्पतालों को सील किए जाने की परिस्थितियों, दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया और कथित रिश्वत मांगने के मामले से संबंधित तथ्यों की पड़ताल की जाएगी।
डिप्टी सीएम ने एक सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई का विवरण भी मांगा गया है। इस निर्देश के बाद स्वास्थ्य विभाग में मामले को लेकर हलचल तेज हो गई है।
वायरल वीडियो से उठे कई गंभीर सवाल
कथित वीडियो सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन अस्पतालों को अनियमितताओं के कारण बंद कराया गया था, उन्हें दोबारा संचालन की अनुमति देने के लिए किस प्रकार की प्रक्रिया अपनाई जा रही थी। क्या पुराने अस्पताल के नाम और पंजीकरण को बदलकर उसकी पिछली अनियमितताओं से बचने का रास्ता निकाला जा सकता है? क्या पंजीकरण से जुड़े दस्तावेजों की पर्याप्त जांच की जा रही थी? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
अस्पतालों का संचालन करने के लिए निर्धारित मानकों का पालन करना आवश्यक होता है। इनमें योग्य चिकित्सकों की उपलब्धता, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, जरूरी चिकित्सा उपकरण, साफ-सफाई, आपातकालीन सुविधाएं और अन्य वैधानिक आवश्यकताएं शामिल हैं। किसी अस्पताल को नियमों के उल्लंघन के कारण सील किया जाता है, तो उसका दोबारा संचालन संबंधित अधिकारियों की अनुमति और निर्धारित प्रक्रियाओं के अधीन होता है।
ऐसे में यदि कोई अस्पताल पुरानी कमियों को दूर किए बिना केवल नाम बदलकर दोबारा संचालन शुरू करता है, तो इससे मरीजों की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो सकता है।
उन्नाव के अस्पताल से जुड़ा मामला भी चर्चा में
इस विवाद के बीच उन्नाव के शेखपुर नरी स्थित उत्तम हॉस्पिटल का मामला भी सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस अस्पताल को पहले सील किया गया था। अस्पताल के संचालन से जुड़े एक व्यक्ति पर गंभीर आपराधिक आरोप भी लगे हैं, जिनकी अलग कानूनी प्रक्रिया है।
सामने आई रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सील अस्पताल को नए नाम से पंजीकृत कराकर दोबारा संचालित करने को लेकर बातचीत हुई थी। हालांकि, इस संबंध में वीडियो की प्रामाणिकता और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल
उत्तर प्रदेश में निजी अस्पतालों के पंजीकरण, नवीनीकरण और निरीक्षण की जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग की निर्धारित व्यवस्था के अंतर्गत आती है। विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि अस्पताल मरीजों को सुरक्षित और मानक के अनुरूप चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराएं।
इस मामले ने विभागीय निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि कोई अस्पताल सील होने के बाद नए नाम से दोबारा संचालन की अनुमति हासिल करने की कोशिश करता है, तो संबंधित अधिकारियों के लिए उसके पुराने रिकॉर्ड की जांच करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों के पंजीकरण और निरीक्षण की प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा जवाबदेही बढ़ाना जरूरी है। इससे अनियमितताओं पर रोक लगाने के साथ मरीजों को सुरक्षित उपचार उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।
दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के निर्देश
डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मरीजों का शोषण और नियमों का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
मामले में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, लखनऊ में संबंधित प्रकरण से जुड़े एक लिपिक को पद से हटाए जाने की कार्रवाई की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, इस प्रशासनिक कदम और कथित रिश्वतखोरी के आरोपों में अंतिम दोष निर्धारण अलग-अलग विषय हैं।
अब सभी की निगाहें स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। जांच में यह स्पष्ट होगा कि अस्पतालों को नए नाम से संचालित कराने की कथित कोशिशों में किन लोगों की भूमिका थी और क्या इसके बदले वास्तव में रिश्वत की मांग की गई थी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर अस्पतालों की निगरानी, पंजीकरण प्रक्रिया और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सरकार की ओर से जांच और कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर क्या कदम उठाए जाते हैं।