अगरतला: त्रिपुरा हाई कोर्ट ने मंगलवार को पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 10 अगस्त को अगरतला में एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ भाषण के लिए उनके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी।
जस्टिस टी अमरनाथ गौड़ और जस्टिस बिस्वजीत पालित की डिवीजन बेंच ने कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध (cognisable offences) होने का संकेत मिलता है, जिसकी आगे जांच जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि सरकार द्वारा इस्तेमाल किए गए बंगाली वाक्यांश के अनुवाद और संदर्भ-आधारित अर्थ को लेकर विवादों की जांच रिट याचिका के चरण में निर्णायक रूप से नहीं की जा सकती।
यह FIR 16 अगस्त को पश्चिम अगरतला पुलिस स्टेशन में प्रबीर रॉय की शिकायत पर दर्ज की गई थी। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 192, 353(1)(b) और 61(1) लगाई गई हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, सरकार ने चेतावनी दी थी कि अगर 11 सूत्रीय मांगों को नहीं माना गया तो राज्य और केंद्र सरकारों के खिलाफ आंदोलन तेज हो जाएगा। रॉय ने आरोप लगाया कि पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा इस्तेमाल किए गए बंगाली वाक्यांश का मतलब एक उग्र या आक्रामक आंदोलन का आह्वान था, जिससे हिंसा भड़क सकती थी और कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती थी।
सरकार ने आरोपों का खंडन करते हुए तर्क दिया कि उनकी बातों का गलत अनुवाद किया गया और उन्हें संदर्भ से हटकर पेश किया गया। उनके वकील ने कहा कि यह भाषण केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों और अन्य नागरिक समाज समूहों द्वारा आयोजित देशव्यापी विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में दिया गया था।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया था और प्रतिभागियों से गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के साथ शांतिपूर्ण ढंग से सहयोग करने का आग्रह किया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि FIR राजनीतिक कारणों से दर्ज की गई थी और उनके कहे गए शब्दों से वे अपराध नहीं बनते जिनका जिक्र मामले में किया गया है।
याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह भाषण कानून-व्यवस्था की तनावपूर्ण स्थिति के बीच लोगों की भारी भीड़ के सामने दिया गया था। सरकार ने कोर्ट को बताया कि सदर में सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट के कार्यालय की ओर मार्च करते समय 5,000 से अधिक प्रतिभागियों ने सुरक्षा के दो बैरिकेड तोड़ दिए थे, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें रोका। हालांकि, राज्य ने साफ़ किया कि बैरिकेड तोड़ने की घटना सरकार के सभा को संबोधित करने से पहले हुई थी और इसका उनके भाषण से कोई लेना-देना नहीं था। राज्य का तर्क था कि भाषण के समय के हालात और दर्शकों पर इसके संभावित असर को देखते हुए विस्तृत जांच की ज़रूरत थी।
बेंच ने कहा कि शुरुआती चरण में FIR रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए। बेंच ने कहा कि जांच करने वालों को भाषण का पूरा संदर्भ, दर्शकों की प्रतिक्रिया और उपलब्ध ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग को ध्यान में रखते हुए पूरे भाषण की जांच करनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि असल में दंगा न होने का मतलब यह नहीं है कि BNS की धारा 192 लागू नहीं हो सकती।
याचिका खारिज करते हुए बेंच ने सरकार को सलाह दी कि वे भविष्य में भड़काऊ या नफ़रत फैलाने वाले भाषण न दें और उनसे शांति, सद्भाव और भाईचारा बढ़ाने का आग्रह किया।
सरकार की उम्र और मुख्यमंत्री के तौर पर उनके कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने आगे कहा कि वे ज़मानत की उचित अर्ज़ी के साथ निचली अदालत में जा सकते हैं, जिस पर शर्तों के साथ विचार किया जाएगा।
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