हैदराबाद : आंध्र प्रदेश सामने आया एक हैरान करने वाला मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है। उम्रकैद की सजा काट रहा एक कैदी सिर्फ 30 दिन की पैरोल पर जेल से बाहर आया था, लेकिन इसके बाद वह करीब 40 साल तक वापस जेल नहीं लौटा। इस दौरान उसने अपनी पहचान छिपाकर सामान्य जिंदगी जी और सरकारी स्कूल में शिक्षक तक बन गया। इतना ही नहीं, उसे राज्य स्तर पर ‘बेस्ट टीचर’ अवॉर्ड भी मिल चुका था।
मामला आंध्र प्रदेश के तत्कालीन वारंगल क्षेत्र से जुड़ा है। कैदी का नाम संडुला वीरन्ना बताया गया है। साल 1983 में उसे हत्या और दंगा मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। सजा काटने के करीब छह महीने बाद उसे पैरोल मिली थी। नियमों के अनुसार उसे मार्च 1984 में वापस जेल लौटना था, लेकिन वह वापस नहीं आया।
पैरोल खत्म हुई, लेकिन कैदी नहीं लौटा
जेल प्रशासन के नियमों के मुताबिक पैरोल केवल कुछ समय के लिए दी जाती है और तय अवधि पूरी होने के बाद कैदी को वापस जेल में आना होता है। लेकिन वीरन्ना ने पैरोल की अवधि खत्म होने के बाद भी जेल में रिपोर्ट नहीं की।
इसके बाद उसने एक नई पहचान के साथ जिंदगी शुरू कर दी। वह लंबे समय तक कानून की नजरों से बचा रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी कि वह उम्रकैद की सजा पाने वाला कैदी है।
सरकारी शिक्षक बनकर बिताए 40 साल
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि फरार रहने के दौरान वीरन्ना ने सरकारी नौकरी हासिल कर ली। वह आंध्र प्रदेश के गुडीवाडा क्षेत्र में सरकारी स्कूल शिक्षक के रूप में काम करने लगा।
करीब चार दशक तक उसने शिक्षक की नौकरी की और 2013 में सरकारी सेवा से रिटायर भी हो गया। इसके बाद उसे पेंशन भी मिलती रही। साल 2004 में उसे राज्य सरकार की ओर से ‘बेस्ट टीचर’ पुरस्कार मिलने की बात भी सामने आई है।
पुलिस और जेल प्रशासन पर उठे सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद जेल प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। एक उम्रकैद का कैदी इतने लंबे समय तक फरार रहा और इस दौरान सरकारी नौकरी तक हासिल कर ली, लेकिन संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं मिली।
तेलंगाना हाई कोर्ट ने भी इस मामले पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि 40 साल तक एक कैदी का पता नहीं चल पाना और उसका सरकारी सेवा में बने रहना व्यवस्था की बड़ी चूक को दर्शाता है।
2024 में STF ने किया गिरफ्तार
करीब 40 साल बाद इस मामले में बड़ा मोड़ आया। 16 मई 2024 को सेंट्रल जेल वारंगल की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने वीरन्ना को पकड़ लिया। गिरफ्तारी के बाद उसे जेल भेज दिया गया और उसकी पैरोल अवधि से अधिक समय तक बाहर रहने को लेकर कार्रवाई शुरू की गई।
कोर्ट ने राहत देने से किया इनकार
वीरन्ना की पत्नी ने अदालत में याचिका दायर कर राहत की मांग की थी। परिवार की ओर से उम्र और स्वास्थ्य संबंधी दलीलें दी गईं, लेकिन तेलंगाना हाई कोर्ट ने राहत देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरी हासिल करना और इतने लंबे समय तक कानून से बचना उसके पक्ष में राहत का आधार नहीं हो सकता। अदालत ने माना कि उसने जानबूझकर अपनी सजा और पहचान छिपाई।
सिस्टम के लिए बड़ा सबक
यह मामला जेल प्रशासन, पुलिस निगरानी और पैरोल व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करता है। पैरोल पर छोड़े गए कैदियों की निगरानी कितनी जरूरी है, यह घटना इसका बड़ा उदाहरण है।
एक तरफ जहां वीरन्ना ने समाज में एक शिक्षक के रूप में पहचान बनाई, वहीं दूसरी तरफ वह कानून की नजर में उम्रकैद का दोषी बना रहा। चार दशक तक चली यह कहानी अब देशभर में चर्चा का विषय बन गई है।
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