हैदराबाद: 18 सितंबर को IIT बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या से कैंपस में भेदभाव का मुद्दा फिर से चर्चा में आ गया है। फिर भी, तेलंगाना में प्रस्तावित 'रोहित वेमुला तेलंगाना (उच्च शिक्षा में पहचान-आधारित भेदभाव की रोकथाम) विधेयक, 2026' पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
रोहित विधेयक अभी भी कैबिनेट की एक उप-समिति के पास है, जिसने इस पर जनता से राय मांगी थी, जबकि मॉनसून सत्र 18 सितंबर को खत्म हो गया; वहीं कर्नाटक कैबिनेट ने 16 अप्रैल को ही अपने विधेयक को मंज़ूरी दे दी थी।
हैदराबाद यूनिवर्सिटी में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (ASA) के अध्यक्ष दया ने कहा, "कैंपस में भेदभाव बहुत छोटे स्तर पर भी हो सकता है और इस तरह के भेदभाव की जांच होनी चाहिए।" उन्होंने कहा कि शारीरिक शोषण या साफ़ तौर पर अपशब्द कहना ही छात्रों के साथ होने वाले असमान व्यवहार का एकमात्र तरीका नहीं है; उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार द्वारा ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने से पहले ASA से सलाह-मशविरा किया जाए।
कैबिनेट ने 17 अप्रैल को डिप्टी सीएम मल्लू भट्टी विक्रमार्का की अध्यक्षता में मंत्रियों की एक उप-समिति बनाई थी। 16 जुलाई को हुई पहली बैठक में, भट्टी ने अधिकारियों से कहा कि वे विधानसभा में पेश करने के लिए ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने से पहले एक रिपोर्ट तैयार करें।
सुप्रीम कोर्ट की वकील दिशा वाडेकर ने कानूनी विशेषज्ञ के तौर पर बैठक में हिस्सा लिया। उन्होंने उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव से जुड़े मामलों में राधिका वेमुला और आबेदा सलीम तडवी का पक्ष भी रखा है।
वाडेकर ने कहा, "UGC के नियम अनिवार्य हैं; वे केवल सलाह नहीं हैं। लेकिन वे नियम हैं, जबकि एक कानून (Act) में विधायी ताकत होती है।" उन्होंने तर्क दिया कि अगर यूनिवर्सिटी बॉडीज़ मौजूदा नियमों के तहत कार्रवाई करने में नाकाम रहती हैं, तो कानूनी समर्थन (statutory backing) नियमों के पालन को मज़बूत बना सकता है।
तेलंगाना के प्रस्तावित विधेयक के शीर्षक में "पहचान-आधारित भेदभाव" जैसे व्यापक शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन सरकार ने अभी तक उन श्रेणियों या प्रस्तावित शिकायत निवारण तंत्र के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं बताया है जिन्हें सुरक्षा दी जाएगी।
कर्नाटक के विधेयक की आलोचना इसलिए हुई है क्योंकि इसमें मुख्य रूप से SC और ST छात्रों पर ध्यान दिया गया है। ऑल इंडिया OBC स्टूडेंट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष और UoH के PhD स्कॉलर डॉ. गौड़ किरण कुमार ने कहा कि एसोसिएशन ने कर्नाटक से OBC छात्रों को भी सुरक्षा देने की मांग की थी और वे चाहते हैं कि तेलंगाना भी अपने कानून में उन्हें शामिल करे। उन्होंने कहा, "उन्होंने हमसे सलाह नहीं ली है। हम उनसे OBCs को भी शामिल करने के लिए कहते रहे हैं।"
तेलंगाना हाई कोर्ट के वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. बी. कार्तिक नवायाण ने अक्टूबर 2025 में 'कैंपेन फॉर रोहित एक्ट' को दिए लिखित सुझाव में तर्क दिया था कि किसी संस्थान के भीतर बनी इक्विटी कमेटी में संरचनात्मक स्वतंत्रता की कमी होगी। उन्होंने कैंपस के बाहर ज़िला-स्तरीय भेदभाव-विरोधी कमेटियां बनाने, जांच के लिए तय समय-सीमा और शिकायतों में बाधा डालने वाले संस्थानों के लिए सज़ा का प्रस्ताव रखा।
उन्होंने लिखा, "जांच में संरचनात्मक स्वतंत्रता के बिना, रोहित वेमुला की विरासत विफल हो जाएगी। यह सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई बनकर रह जाएगा।"
रोहित एक्ट की मांग जनवरी 2016 में UoH में रोहित वेमुला की मौत के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों से शुरू हुई थी। बाद में कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को अपनी राष्ट्रीय नीति में शामिल किया। उसके 2024 के लोकसभा घोषणापत्र में "पिछड़े और दबे-कुचले समुदायों" के छात्रों के साथ भेदभाव से निपटने के लिए रोहित वेमुला एक्ट लाने का वादा किया गया था। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 17 अप्रैल, 2025 को मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी को पत्र लिखकर तेलंगाना से ऐसा कानून बनाने को कहा।
वाडेकर ने कहा, "संस्थागत स्तर पर भेदभाव अक्सर छिपा हुआ और अप्रत्यक्ष होता है। यह हमेशा किसी के जातिवादी शब्दों या अपशब्दों के इस्तेमाल का रूप नहीं लेता है।"
उन्होंने शिकायत निवारण निकायों में छात्रों, जाति और लिंग के आधार पर प्रतिनिधित्व के साथ-साथ बाहरी विशेषज्ञों को शामिल करने और बदले की कार्रवाई के खिलाफ़ मज़बूत सुरक्षा उपायों की मांग की। उन्होंने शिकायतें आने से पहले ही पूर्वाग्रह से निपटने के उपाय करने की भी बात कही।
उन्होंने कहा, "छात्र और प्रोफेसर पूर्वाग्रहों के साथ इन जगहों पर आते हैं। हम आरक्षण से जुड़ी गलतफहमियों को दूर करने या यह समझाने के लिए कुछ नहीं करते कि आरक्षण की ज़रूरत क्यों है।" कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अपने अनुभव का ज़िक्र करते हुए वाडेकर ने कहा कि वहां छात्रों के शैक्षणिक कोर्स शुरू करने से पहले अनिवार्य ओरिएंटेशन में नस्ल, लिंग, प्रवास और उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर बात की जाती थी।
ह्यूमन राइट्स फोरम (HRF) ने भी शैक्षणिक संस्थानों में नियमित रूप से संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कार्यक्रम आयोजित करने की मांग की।
ह्यूमन राइट्स फोरम की आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समन्वय समिति के सदस्य एस. जीवन कुमार ने कहा, "हम इस बिल का समर्थन करते हैं, लेकिन सिर्फ़ कानून बनाने से भेदभाव या पूर्वाग्रह खत्म नहीं होगा। कैंपस और शैक्षणिक संस्थानों में नियमित रूप से संवेदनशीलता बढ़ाने और शिक्षा देने की ज़रूरत है।" कुमार ने कहा कि जब तक बिल लंबित है, राज्य भेदभाव-रोधी अंतरिम दिशानिर्देश जारी कर सकता है। APPSC-IIT बॉम्बे ने कुछ साल पहले दलित छात्र की आत्महत्या के बाद ऐसी ही मांग की थी और कहा था, "हमें IIT जैसे 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ एमिनेंस' (प्रतिष्ठित संस्थान) की ज़रूरत नहीं है; हमें 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ एम्पैथी' (सहानुभूति वाले संस्थान) की ज़रूरत है।"