हैदराबाद: हैदराबाद विश्वविद्यालय के 46 फाइन आर्ट्स छात्रों की एक प्रदर्शनी में यह दिखाया गया कि कैसे कला व्यक्तिगत अनुभवों, सामाजिक मुद्दों और बदलते दृष्टिकोणों को दर्शाती है।

सोमवार को सालार जंग संग्रहालय में आयोजित 'ड्रॉइंग कन्वर्सेशन इन-बिटवीन मोमेंट्स' (Drawing Conversation In-Between Moments) नाम की इस प्रदर्शनी में, अवलोकन, प्रयोग और रोजमर्रा के अनुभवों पर आधारित विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों को एक साथ पेश किया गया।

कक्षा में होने वाली सामान्य प्रदर्शनियों से अलग, इस पहल के तहत छात्रों के काम को एक संग्रहालय के स्थान पर प्रदर्शित किया गया।

प्रदर्शनी में शामिल बी. मधुसूदन ने 'सर्वाइव एंड फाइंड आउट' (Survive and Find Out) कॉन्सेप्ट के जरिए प्रकृति और वस्तुओं के साथ इंसानों के जुड़ाव को दिखाया। उन्होंने कल्पना की कि जानवर मोबाइल फोन का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं, और इंसान नारियल की टहनी को अलग-अलग कामों के लिए कैसे ढाल सकते हैं।

थोरती शरथ ने अपने दादाजी से प्रेरणा ली, जो एक मैनुअल स्कैवेंजर (हाथ से मैला ढोने वाले) थे और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण चल बसे थे।

जाति-आधारित उनकी यह कलाकृति चमड़े पर एक हफ्ते में तैयार की गई थी। इसके जरिए उन्होंने अपने दादाजी और उन अन्य लोगों को सम्मान दिया, जिन्हें इसी तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था।

इस प्रदर्शनी का मुख्य आकर्षण सगुरी ईश्वर राव की बनाई एक विशाल मछली थी (180 इंच की)। यह तटीय आंध्र प्रदेश के मछुआरा समुदायों के जीवन और पारंपरिक तरीकों के खत्म होने के साथ उनके संघर्षों को दर्शाती है।

अन्य कलाकृतियों में राइस पेपर पर कॉफी से बनी कृतियां, राइस पेपर पर वॉटर-कलर और सोने की पन्नी (गोल्ड फॉयल) का काम, तथा कार्डबोर्ड पर लगे कागज पर चारकोल से बनी कलाकृतियां शामिल थीं।

यह प्रदर्शनी, हैदराबाद विश्वविद्यालय (UoH) के फैकल्टी डॉ. एलएनवी श्रीनिवास और तन्मय सांतरा द्वारा पिछले दो दशकों में विकसित की गई शैक्षणिक पहलों का हिस्सा है।

प्रोफेसर श्रीनिवास ने बताया कि छात्रों ने संग्रहालय में चार दिनों तक अपनी कलाकृतियों पर काम किया। उन्होंने छात्रों की विकसित होती कलात्मक शैलियों पर संतोष व्यक्त किया।

यह प्रदर्शनी 1 नवंबर तक खुली रहेगी।

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