हैदराबाद: यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद (UoH) के शोधकर्ताओं ने IIT दिल्ली, IIT भुवनेश्वर और कराईकुडी स्थित CSIR-सेंट्रल इलेक्ट्रोकेमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (CECRI) की टीमों के साथ मिलकर, मेटल अलॉय (धातु मिश्र) की एक ऐसी श्रेणी विकसित की है, जो मेडिकल इम्प्लांट्स को अधिक मजबूत, टिकाऊ और सुरक्षित बना सकती है।
टाइटेनियम, कोबाल्ट और क्रोमियम को बराबर या लगभग बराबर मात्रा में मिलाकर बनाए गए इन अलॉय में प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान उच्च मजबूती, घिसाव और जंग (corrosion) के प्रति प्रतिरोध क्षमता देखी गई। साथ ही, ये जीवित कोशिकाओं के साथ भी पूरी तरह अनुकूल पाए गए। इनका उपयोग कृत्रिम हिप जॉइंट (कूल्हे के जोड़) और बोन प्लेट्स बनाने में किया जा सकता है।
यह अध्ययन नंदा किशोर कर्णम के डॉक्टरेट शोध का हिस्सा था, जिसे UoH के स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफेसर कोटेश्वर राव वी. राजुलपति के मार्गदर्शन में पूरा किया गया। यह शोध 'एडवांस्ड हेल्थकेयर मैटेरियल्स' नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसे विली (Wiley) द्वारा निकाला जाता है।
इस शोध टीम में IIT दिल्ली के डॉ. जुनैद सैयद और प्रोफेसर नित्यानंद गोस्वामी; IIT भुवनेश्वर के रविशंकर सुमन और प्रोफेसर श्रीकांत गोल्लापुडी; तथा कराईकुडी स्थित CSIR-CECRI की डॉ. एन मैरी मैथ्यू और डॉ. दीपक कुमार पट्टनायक भी शामिल थे।
पारंपरिक इम्प्लांट्स में आमतौर पर ऐसे अलॉय का उपयोग किया जाता है, जिनमें एक मुख्य धातु आधार (base) का काम करती है। समय के साथ, ये सामग्रियां घिस सकती हैं या इनमें जंग लग सकता है, जिससे धातु के आयन (metal ions) आसपास के ऊतकों (tissues) में मिल सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इनकी कठोरता (stiffness) प्राकृतिक हड्डियों की तुलना में बहुत अधिक होती है, जिसके कारण इम्प्लांट ढीले हो सकते हैं और मरीज को दोबारा सर्जरी करानी पड़ सकती है।
इसके बजाय, टीम ने तीनों धातुओं को बराबर या लगभग बराबर मात्रा में मिलाकर 'मल्टी-प्रिंसिपल एलिमेंट अलॉय' (MPEAs) तैयार किए, जिनमें कोई एक धातु हावी नहीं होती।
प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि टाइटेनियम-कोबाल्ट-क्रोमियम (TiCoCr) अलॉय में उच्च मजबूती और घिसाव के प्रति प्रतिरोध क्षमता है—जो कृत्रिम जोड़ों जैसे इम्प्लांट्स के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमें लगातार हलचल होती रहती है। इनकी लचीलापन (flexibility) पारंपरिक इम्प्लांट धातुओं की तुलना में प्राकृतिक हड्डियों के अधिक करीब है, जिससे इनके ढीले होने का खतरा कम हो सकता है।
परीक्षणों के दौरान, मानव शरीर के भीतर की स्थितियों की नकल करने वाले तरल पदार्थों का उपयोग किया गया, जिनमें ये अलॉय जंग से सुरक्षित रहे। टीम ने बताया कि सेल स्टडी (कोशिका अध्ययन) से पता चला है कि ये अलॉय बिना किसी विषाक्त प्रभाव के स्वस्थ कोशिकाओं के विकास में सहायक हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि मजबूती, जंग-रोधी क्षमता और बायोकम्पैटिबिलिटी (जैविक अनुकूलता) का मेल इन मिश्र धातुओं को भविष्य के मेडिकल इम्प्लांट्स के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाता है। हालाँकि, ये नतीजे प्रयोगशाला परीक्षणों पर आधारित हैं, और मरीजों में इन मिश्र धातुओं का इस्तेमाल करने से पहले इनका और अधिक मूल्यांकन किया जाना जरूरी है।