हैदराबाद: मेडचल-मलकाजगिरी जिले के दो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में लगाई गई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित स्क्रीनिंग मशीनों की मदद से तीन आशा कार्यकर्ताओं में ब्रेस्ट कैंसर का पता चला है। इससे बीमारी का जल्दी पता चलने के महत्व का पता चलता है।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के CSR प्रोग्राम के सहयोग से 'महिता फाउंडेशन' की एक पहल के तहत अलवाल और कुशैगुडा PHC में ये मशीनें लगाई गई हैं। इनका इस्तेमाल महिलाओं में ब्रेस्ट और सर्वाइकल कैंसर की जांच (स्क्रीनिंग) के लिए किया जा रहा है। हालांकि, इन केंद्रों को जरूरी सामान (consumables) जुटाने और स्टाफ को उचित ट्रेनिंग देने में कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

अलवाल में अधिकारियों ने बताया कि मशीन को अपग्रेड करने की जरूरत है, जिसमें लाखों के बजाय कुछ हजार रुपये का खर्च आएगा। कुशैगुडा PHC की मेडिकल ऑफिसर डॉ. डी. सुप्रिया ने बताया कि आशा कार्यकर्ताओं समेत लगभग 1,500 महिलाओं की स्क्रीनिंग की गई है। इनमें 45 साल की एक आशा कार्यकर्ता में स्टेज II ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। डॉ. सुप्रिया ने बताया, "उन्हें एक गांठ महसूस हुई थी और उन्होंने पहले भी जांच कराई थी, लेकिन तब उन्हें बताया गया कि यह फाइब्रॉइड है। उन्होंने कैंसर स्क्रीनिंग नहीं कराई थी। यह मशीन बहुत मददगार साबित हुई है, क्योंकि अब आउटपेशेंट वार्ड (OPD) में आने वाली महिलाओं की भी स्क्रीनिंग हो पा रही है।"

जिन मामलों में कैंसर का संदेह होता है, उन्हें आगे की जांच के लिए मलकाजगिरी एरिया हॉस्पिटल या MNJ इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी में रेफर कर दिया जाता है।

'UE लाइफसाइंसेज' द्वारा विकसित 'iब्रेस्टएग्जाम' (iBreastExam) नाम की यह ब्रेस्ट स्क्रीनिंग मशीन एक हैंडहेल्ड स्कैनर है, जो ब्लूटूथ के जरिए स्मार्टफोन से जुड़ जाती है। हेल्थकेयर वर्कर इस मशीन को ब्रेस्ट के ऊपर घुमाते हैं, और ऐप किसी भी संदिग्ध बदलाव (tissue changes) को चिह्नित कर देता है। यह मशीन खुद कैंसर का डायग्नोसिस नहीं करती; अगर नतीजे असामान्य आते हैं, तो महिला को मैमोग्राफी, बायोप्सी या किसी विशेषज्ञ से सलाह लेने के लिए भेजा जाता है।

इस पहल में 'सर्व-एआई-कल' (cervAIcal) नाम का एक स्मार्टफोन-आधारित सर्वाइकल स्क्रीनिंग सिस्टम भी शामिल है। हर मशीन की कीमत लगभग 20 लाख रुपये है और इससे करीब 5,000 महिलाओं की स्क्रीनिंग की जा सकती है। स्टाफ को इस उपकरण को चलाने और प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए तीन दिन की ट्रेनिंग दी गई थी।

अधिकारियों ने बताया कि कार्ट्रिज की कमी और और अधिक ट्रेनिंग की जरूरत के कारण इस सुविधा की पहुंच सीमित हो रही है। उन्होंने जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया, क्योंकि कई महिलाएं सामाजिक शर्म (stigma), खर्च या सुविधाओं तक पहुंच न होने के कारण स्क्रीनिंग कराने में देरी करती हैं। साल 2020 में तेलंगाना में स्तन कैंसर के मामले प्रति लाख महिलाओं पर 40.2 आंके गए, जबकि राष्ट्रीय औसत 31.3 था। लगभग 60 प्रतिशत मामलों का पता तब चलता है जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है, जिससे यह साफ होता है कि स्क्रीनिंग की सुविधा आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए।

स्वास्थ्य कर्मियों का कहना है कि विभाग से लगातार मिलने वाला सहयोग—जिसमें जरूरी सामग्री की आपूर्ति और नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम शामिल हैं—स्क्रीनिंग का दायरा बढ़ाने और समय पर मरीजों को आगे के इलाज के लिए रेफर करने में मददगार साबित होगा।

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