हैदराबाद: यूनिवर्सिटी ऑफ़ हैदराबाद (UoH) के रिसर्चर्स ने एक ऐसे प्रोटीन की पहचान की है जो टमाटर के पौधों में पुरानी पत्तियों से नई कोशिकाओं (tissues) तक फॉस्फेट को फिर से पहुँचाने में मदद करता है। यह खोज फॉस्फेट के इस्तेमाल की क्षमता को बेहतर बना सकती है और ऐसी ज़्यादा पैदावार वाली फ़सलें विकसित करने में मदद कर सकती है जिनमें कम केमिकल फ़र्टिलाइज़र की ज़रूरत हो।

'जर्नल ऑफ़ एक्सपेरिमेंटल बॉटनी' में प्रकाशित यह स्टडी टमाटर के पौधों में फॉस्फेट (Pi) के दोबारा वितरण और फॉस्फोरस के संतुलन को कंट्रोल करने वाले एक अहम प्रोटीन, SlPAP26b (एक पर्पल एसिड फॉस्फेटेज़) की पहचान करती है।

पौधों की बढ़त के लिए फॉस्फोरस बहुत ज़रूरी है, लेकिन मिट्टी में इसके उपलब्ध न होने की वजह से आम फ़र्टिलाइज़र असरदार नहीं रह जाते। इसलिए पौधे इस पोषक तत्व को अंदर ही अंदर रीसायकल और दोबारा वितरित करते हैं। एक इंटीग्रेटेड 'ओमिक्स' अप्रोच का इस्तेमाल करके, रिसर्चर्स ने SlPAP26b को इस प्रक्रिया में शामिल एक अहम जीन के तौर पर पहचाना। यह पत्तियों और जड़ों में, और खासकर पत्तियों के सूखने या झड़ने (senescence) के दौरान एक्टिव रहता था।

पता चला कि ट्रांसक्रिप्शन फ़ैक्टर SlPHR1 और SlPHL1, SlPAP26b के प्रमोटर में मौजूद P1BS एलिमेंट से जुड़कर उसे सीधे एक्टिवेट करते हैं, जिससे यह प्रोटीन पौधे के फॉस्फेट की कमी के प्रति प्रतिक्रिया (फॉस्फेट-स्टार्वेशन रिस्पॉन्स) से जुड़ जाता है।

 

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