हैदराबाद: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने वाले एक फर्जी कॉल सेंटर घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में चार मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है। ED के हैदराबाद जोनल ऑफिस ने 'प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट' (PMLA), 2002 के तहत हर्षिल नयनभाई रावल, जसवंत सिंह, चेतन मुंजाल और प्रणव पिठाडिया को गिरफ्तार किया। उन्हें नामपल्ली की विशेष अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक
हिरासत में
भेज दिया गया।
केंद्रीय एजेंसी ने बुधवार को एक विज्ञप्ति में बताया कि इसी मामले में जुलाई-अगस्त के दौरान विकास निमार, ताराचंद निमार और मो. इरफान अंसारी को भी गिरफ्तार किया गया था। इन नई गिरफ्तारियों के साथ, इस मामले में ED द्वारा गिरफ्तार किए गए लोगों की कुल संख्या सात हो गई है। 15 सितंबर को, ED ने पटियाला, पुणे और चंडीगढ़ में छापेमारी की, जहां तीन सक्रिय कॉल सेंटर मिले। छापेमारी के समय वहां लगभग 220 लोग काम कर रहे थे।
छापेमारी के दौरान डिजिटल डिवाइस, नकदी और कुछ दस्तावेज जब्त किए गए। अब तक 79 डिजिटल डिवाइस की फोरेंसिक जांच पूरी हो चुकी है। इनमें 65 मोबाइल फोन, 13 लैपटॉप/कंप्यूटर और एक डेटा स्टोरेज डिस्क शामिल हैं। इनमें इस गिरोह की चैट, लेजर, कॉलिंग डेटा, पीड़ितों के रिकॉर्ड और क्रिप्टो वॉलेट मिले हैं।
ED ने यह जांच तब शुरू की जब भारत से चलाए जा रहे कॉल सेंटरों के जरिए अमेरिकी नागरिकों के साथ धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश रची गई। इसमें आरोपी खुद को सरकारी अधिकारी बताते थे और फर्जी सरकारी दस्तावेजों व पहचान पत्रों का इस्तेमाल करते थे। एजेंसी के अनुसार, जांच से पता चला है कि यह गिरोह एक संगठित तरीके से 'कॉलिंग फ्लोर' (फर्जी कॉल सेंटर) चला रहा था, जिसमें कर्मचारी 'डायलर्स', 'बैंकर्स' और 'क्लोजर्स' के रूप में काम करते थे।
ये लोग अमेरिकी नागरिकों से संपर्क करके उन्हें बताते थे कि उनके खातों से कोई फर्जी खरीदारी हुई है या कोई चार्ज लगा है। इसके बाद, वे खुद को अमेरिकी एजेंसियों—जैसे ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस, फेडरल ट्रेड कमीशन और डिपार्टमेंट ऑफ द ट्रेजरी—के अधिकारी बताकर उन्हें डराते-धमकाते थे। इसके लिए वे फर्जी पहचान पत्र, बैज, आधिकारिक पत्र और अदालती दस्तावेजों का इस्तेमाल करते थे। ED ने बताया कि कानूनी कार्रवाई की धमकी देकर, पीड़ितों को इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे नकद और सोना कुछ लोगों (पिक-अप पर्सन्स) को सौंप दें, कूरियर के जरिए पार्सल में नकद भेजें, या 'मनी म्यूल' (धोखाधड़ी में इस्तेमाल होने वाले) चैनलों के अमेरिकी बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करें। इसके अलावा, दुबई और अन्य देशों के खातों के जरिए भी पैसे ट्रांसफर करवाए गए। ED ने बताया कि कॉल सेंटर अमेरिकी नागरिकों को कैसे ठगता था: लगभग 20 लाख अमेरिकी फोन नंबरों की एक लिस्ट तैयार की गई, जिसमें लोगों के नाम, पते और उम्र (इनमें कई बुजुर्ग भी शामिल थे) की जानकारी थी। इस डेटा को जर्मनी और फिनलैंड के सर्वर पर मौजूद 'ऑटो-डायलर्स' में फीड कर दिया गया था।
पीड़ितों को खरीदारी, रिफंड या उनके कंप्यूटर में वायरस होने के फर्जी अलर्ट मिलते थे, या फिर किसी अमेरिकी नंबर से कॉल आता था। उन्हें एक टोल-फ्री हेल्पलाइन पर कॉल करने के लिए कहा जाता था, जिसे भारत से ऑपरेट किया जा रहा था। ED के अनुसार, कॉल करने वाले खुद को DEA, डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस, FTC और US ट्रेजरी का अधिकारी बताते थे। वे फर्जी ID कार्ड, बैज, जब्ती के नोटिस और कोर्ट के आदेश दिखाते थे और दावा करते थे कि पीड़ित के खाते ड्रग्स या मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े हैं। पीड़ितों को गिरफ्तारी और उनकी सारी बचत (सेविंग्स) फ्रीज करने की धमकी दी जाती थी।
उन्हें हिदायत दी जाती थी कि वे इस मामले को गुप्त रखें और अपने पैसे को 'सरकार' के पास 'सुरक्षित' रखें। इसके बाद, पीड़ित सोने की ईंटें खरीदते थे, नकद रकम कुछ लोगों को सौंप देते थे, कूरियर के जरिए पार्सल में छिपाकर पैसे भेजते थे, 'मनी म्यूल' खातों या दुबई की कंपनियों में पैसे ट्रांसफर करते थे, बिटकॉइन ATM में नकद जमा करते थे या गिफ्ट कार्ड खरीद लेते थे।
इन डॉलर को उस दिन के रुपये के रेट के हिसाब से बदला जाता था और हवाला, अंगड़िया टोकन, क्रिप्टो (USDT) या दुबई और हांगकांग के खातों के जरिए भारत लाया जाता था। फिर इस पैसे को प्रॉपर्टी, सोने, गाड़ियों और बिजनेस में निवेश कर दिया जाता था। इस पूरे खेल में 'डायलर्स' सबसे पहले संपर्क करते थे, 'बैंकर्स' पीड़ित की बचत की जांच करते थे, और 'क्लोजर्स' (जो खुद को अमेरिकी अधिकारी बताते थे) पैसे वसूलते थे। ED ने जुलाई 2025 से सितंबर 2026 के बीच लगभग 27.39 मिलियन अमेरिकी डॉलर (करीब 261 करोड़ रुपये) की 927 वसूली की घटनाओं की पहचान की है।
यह पूरा ऑपरेशन कई देशों में फैला हुआ था। भारत से अमेरिका में रहने वाले लोगों को कॉल किए जाते थे। इसके लिए 20 लाख लोगों की लिस्ट, उनके अमेरिकी फोन नंबर और जर्मनी व फिनलैंड में होस्ट किए गए ऑटो-डायलर्स सर्वर का इस्तेमाल किया जाता था। जांच से पता चला है कि अमेरिका में रकम इकट्ठा की गई और इसे संयुक्त अरब अमीरात (दुबई) तथा हांगकांग की कंपनियों के खातों और क्रिप्टो-एसेट्स के जरिए घुमाया गया, जिसके बाद यह हवाला और अंगड़िया चैनलों के माध्यम से भारत पहुंची। अमेरिका में अब तक कुल 549 पीड़ितों की पहचान हुई है।
इनमें से कई लोग 1940 के दशक में जन्मे थे। अमेरिका के कुल 6,463 नंबरों पर कॉल या मैसेज किए गए थे। जांच में सामने आया है कि पटियाला में चल रहे 'कॉलिंग फ्लोर' का मालिक और मैनेजर प्रणव पिथाडिया था। अपराध से जुड़ी और रकम का पता लगाने, पैसों के लेन-देन के रास्ते (मनी ट्रेल) को ट्रैक करने और मनी लॉन्ड्रिंग के इस अपराध में शामिल अन्य लोगों या संस्थाओं की भूमिका का पता लगाने के लिए जांच अभी भी जारी है।
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