हैदराबाद। अंतरिक्ष में लगातार बढ़ रहे मलबे और निष्क्रिय उपग्रहों की समस्या से निपटने के लिए हैदराबाद का स्पेस-टेक स्टार्टअप कॉस्मोसर्व स्पेस (Cosmoserve Space) स्वदेशी तकनीक विकसित करने में जुटा है। कंपनी का लक्ष्य अंतरिक्ष में मौजूद बेकार उपग्रहों और अन्य मलबे को पकड़कर हटाना है। इसके साथ ही कंपनी अपने अंतरिक्ष यानों के निर्माण में विदेशी पुर्जों पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम कर रही है। कॉस्मोसर्व ने वर्ष 2027 में अंतरिक्ष के मलबे को पकड़ने और उसे पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाकर नष्ट करने की तकनीक का पूर्ण प्रदर्शन करने की योजना बनाई है।

कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चिरंजीवी फणींद्र ने बताया कि वर्तमान में कॉस्मोसर्व अपने मिशन में इस्तेमाल होने वाले लगभग 60 प्रतिशत पुर्जे स्थानीय स्तर पर प्राप्त कर रही है। कंपनी के अधिकांश मैकेनिकल सिस्टम हैदराबाद में ही विकसित और तैयार किए जा रहे हैं। हालांकि, इलेक्ट्रॉनिक्स और विशेष ऑप्टिकल सिस्टम के लिए अभी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है।

डेक्कन क्रॉनिकल से बातचीत में डॉ. फणींद्र ने कहा कि हैदराबाद में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से जुड़ी स्थानीय कंपनियों का विकास हो रहा है। ऐसे में भविष्य में इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑप्टिकल सिस्टम भी भारत में तैयार किए जा सकेंगे। इससे आयात पर निर्भरता कम होने के साथ अंतरिक्ष मिशनों के लिए आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता बढ़ सकती है।

उन्होंने हैदराबाद की ईओएन स्पेस लैब्स का उदाहरण देते हुए बताया कि यह कंपनी अंतरिक्ष अभियानों के लिए विशेष ऑप्टिकल कैमरे विकसित कर रही है। इन कैमरों का आवश्यक परीक्षण और प्रमाणन पूरा होने के बाद कॉस्मोसर्व इन्हें स्थानीय स्तर पर खरीदने की संभावना तलाश सकती है।

कॉस्मोसर्व ने गचीबोवली के वीएसडी टेक पार्क में अपनी नई सुविधा 'बेस 1' भी शुरू की है। लगभग 14,800 वर्ग फुट में फैले इस केंद्र में अंतरिक्ष रोबोटिक्स और सैटेलाइट सर्विसिंग सिस्टम के डिजाइन, निर्माण और परीक्षण की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।

इस केंद्र में अंतरिक्ष में उपग्रहों की मरम्मत, ईंधन भरने और निष्क्रिय उपग्रहों को हटाने से जुड़ी तकनीकों पर काम किया जाएगा। यहां रोबोटिक कैप्चर, ऑर्बिटल रेंडेवू, माइक्रोग्रैविटी सिमुलेशन, सैटेलाइट इंटीग्रेशन और मिशन कंट्रोल के लिए विशेष प्रयोगशालाएं बनाई गई हैं।

ऑर्बिटल रेंडेवू ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से अंतरिक्ष में मौजूद दो यान नियंत्रित तरीके से एक-दूसरे के करीब पहुंचते हैं। वहीं, रोबोटिक कैप्चर सिस्टम की सहायता से किसी उपग्रह या अंतरिक्ष मलबे को पकड़ा जा सकता है। इन तकनीकों का सफल विकास अंतरिक्ष में मरम्मत और मलबा हटाने जैसी सेवाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

कंपनी अपने 'मिशन एम्ब्रेस' (Mission EMBRACE) के प्रदर्शन को दोबारा करने की तैयारी भी कर रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जुलाई 2026 में स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट के माध्यम से हुए पिछले उड़ान परीक्षण में कंपनी के रोबोटिक कैप्चर सिस्टम के पकड़ने वाले हिस्से, जिन्हें 'पेटल्स' कहा जाता है, निर्धारित तरीके से खुल नहीं पाए थे।

डॉ. फणींद्र ने बताया कि मिशन के टेलीमेट्री डेटा से पता चला कि लगभग 75 प्रतिशत सिस्टम योजना के अनुसार काम कर रहे थे। हालांकि, रोबोटिक कैप्चर सिस्टम के पेटल्स खुलने में तकनीकी समस्या सामने आई थी।

उन्होंने बताया कि रॉकेट लॉन्च के दौरान होने वाले कंपन से सुरक्षा के लिए पेटल्स को केबलों की सहायता से मुख्य संरचना के साथ बांधकर रखा गया था। अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद कमांड मिलने पर इन केबलों को कटना था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके कारण पेटल्स अपनी निर्धारित स्थिति में बंद रह गए।

डॉ. फणींद्र के अनुसार, कम तापमान के कारण नरम पेटल्स के सख्त हो जाने की संभावना भी तकनीकी समस्या का एक कारण हो सकती है। हालांकि, यह एक संभावित वजह बताई गई है।

कंपनी ने अगली उड़ान के लिए केबल काटने और पेटल्स खोलने वाले दोनों सिस्टम में सुधार किया है। इन प्रणालियों को अधिक विश्वसनीय बनाने के साथ अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था भी जोड़ी गई है, ताकि किसी एक हिस्से में समस्या आने पर वैकल्पिक व्यवस्था काम कर सके।

कॉस्मोसर्व का अगला बड़ा लक्ष्य वर्ष 2027 में अंतरिक्ष के मलबे को पकड़ने का पूर्ण-स्तरीय प्रदर्शन करना है। प्रस्तावित मिशन में एक विशेष 'चेजर' अंतरिक्ष यान को ऐसे लक्ष्य की ओर भेजा जाएगा, जो स्वयं किसी प्रकार का सहयोग या नियंत्रण संकेत नहीं दे रहा होगा।

योजना के अनुसार, चेजर यान पहले लक्ष्य से लगभग 25 से 10 मीटर की दूरी तक पहुंचेगा। इसके बाद नियंत्रित तरीके से और करीब जाकर उसे पकड़ने का प्रयास करेगा। लक्ष्य को पकड़ने के बाद उसे पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाकर नष्ट करने की तकनीक का प्रदर्शन किया जाएगा।

इस मिशन का उद्देश्य कंपनी द्वारा विकसित 'ReVIS' आर्किटेक्चर की कार्यक्षमता को जांचना और प्रमाणित करना है। सफल परीक्षण से यह पता चल सकेगा कि कंपनी की तकनीक वास्तविक अंतरिक्ष परिस्थितियों में निष्क्रिय उपग्रहों और मलबे को हटाने के लिए कितनी सक्षम है।

कॉस्मोसर्व दो अंतरिक्ष यानों पर आधारित एक विशेष प्रणाली भी विकसित कर रही है। इस व्यवस्था में एक बड़ा ऑर्बिटल सर्विस स्टेशन अंतरिक्ष में ईंधन, उपकरण और अतिरिक्त पुर्जे लेकर मौजूद रहेगा। इसके साथ एक छोटा स्वायत्त अंतरिक्ष यान काम करेगा, जो अलग-अलग उपग्रहों तक पहुंचकर उनकी जांच, मरम्मत या उन्हें हटाने का कार्य करेगा।

डॉ. फणींद्र ने बताया कि इस प्रणाली को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि एक ही अभियान के दौरान कई निष्क्रिय उपग्रहों की सर्विसिंग की जा सके। इससे अलग-अलग उपग्रहों के लिए बार-बार स्वतंत्र मिशन भेजने की आवश्यकता कम हो सकती है।

कंपनी का मानना है कि एक ही मिशन में कई उपग्रहों की सर्विसिंग करने से लागत को विभिन्न उपग्रह ऑपरेटरों के बीच बांटा जा सकेगा। इससे अंतरिक्ष में मरम्मत और मलबा हटाने की सेवाएं अधिक किफायती बन सकती हैं।

कॉस्मोसर्व ने प्रति उपग्रह सर्विसिंग की लागत को लगभग एक करोड़ डॉलर से घटाकर दस लाख डॉलर से भी कम करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, यह कंपनी का प्रस्तावित व्यावसायिक लक्ष्य है और वास्तविक लागत भविष्य के परीक्षणों तथा संचालन पर निर्भर करेगी।

डॉ. फणींद्र ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में अपनी तकनीकी क्षमता का सफल प्रदर्शन करने के बाद ही कंपनी इन सेवाओं को व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।

कॉस्मोसर्व की योजना अंतरिक्ष मलबा प्रबंधन, उपग्रहों की मरम्मत और स्वदेशी अंतरिक्ष उपकरणों के निर्माण से जुड़ी है। कंपनी अब अपने अगले मिशन के जरिए इन तकनीकों की विश्वसनीयता साबित करने की तैयारी कर रही है।

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