हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि किसी ज़मीन को वक्फ़ संपत्ति घोषित करने वाले अपने नोटिफ़िकेशन को सही साबित करने की ज़िम्मेदारी वक्फ़ बोर्ड की थी। जब ऐसे नोटिफ़िकेशन को चुनौती दी गई, तो वक्फ़ बोर्ड को कोर्ट के सामने वे ज़रूरी रिकॉर्ड पेश करने थे जिनसे यह साबित हो सके कि वक्फ़ एक्ट के तहत ज़रूरी प्रक्रिया का पालन किया गया था।

जस्टिस लक्ष्मी नारायण अलीशेट्टी ने वक्फ़ बोर्ड को इस ज़िम्मेदारी को पूरा न कर पाने के लिए दोषी ठहराया। बोर्ड उन ज़मीन के टुकड़ों (सर्वे नंबर 893, 894, 895, 896, 897 और अन्य, जो उस समय मेदक ज़िले के टूप्रान में थे और जिन्हें वक्फ़ संपत्ति घोषित किया गया था) से जुड़े नोटिफ़िकेशन को सही ठहराने के लिए ज़रूरी सर्वे और जांच के रिकॉर्ड पेश नहीं कर पाया। नतीजतन, कोर्ट ने माना कि नोटिफ़िकेशन को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

जज सैयद गौसिया सुल्ताना और 38 अन्य लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिन्होंने इन संपत्तियों के संबंध में 20 दिसंबर, 2001 के गैज़ेट नोटिफ़िकेशन नंबर 46-A को चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ताओं ने ज़मीन पर अपना अधिकार जताया और कहा कि उनके पास रेवेन्यू रिकॉर्ड, पट्टादार पासबुक और टाइटल डीड हैं, साथ ही वे संपत्तियों पर कब्ज़ा भी रखते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ज़मीन के इन टुकड़ों को बिना किसी नोटिस, जांच या सुनवाई का मौका दिए प्रतिबंधित संपत्तियों की सूची में शामिल कर लिया गया था।

हालांकि, वक्फ़ बोर्ड ने तर्क दिया कि 1960 के दशक में वक्फ़ एक्ट, 1954 के तहत सर्वे किया गया था और ज़मीन के टुकड़ों को वक्फ़ संपत्ति के तौर पर पहचानने से पहले "ढोल-नगाड़े" (tom-tom) के ज़रिए सार्वजनिक घोषणाएं की गई थीं।

हाई कोर्ट ने पाया कि बोर्ड ने सर्वे रिपोर्ट, सर्वे कमिश्नर की कार्यवाही, जांच से जुड़ी सामग्री, आपत्तियां, सार्वजनिक नोटिस का सबूत या कानूनी प्रक्रिया के पालन को दिखाने वाले अन्य समकालीन रिकॉर्ड कोर्ट के सामने पेश नहीं किए थे।

कोर्ट ने कहा कि एक्ट के तहत परिकल्पित सर्वे और जांच ज़रूरी आवश्यकताएं थीं और उन्हें केवल दिखावटी औपचारिकता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि केवल गैज़ेट नोटिफ़िकेशन प्रकाशित कर देने से उस कानूनी प्रक्रिया की जगह नहीं ली जा सकती जो ऐसे नोटिफ़िकेशन से पहले होनी चाहिए थी।

यह मानते हुए कि वक्फ़ बोर्ड याचिकाकर्ताओं की संपत्तियों को वक्फ़ घोषित करने के लिए ज़रूरी कानूनी आवश्यकताओं को साबित करने में विफल रहा, कोर्ट ने गैज़ेट नोटिफ़िकेशन को रद्द कर दिया। मुख्य गवाह को दोबारा बुलाने में देरी के लिए HC ने ACB पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया

हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष (prosecution) ने एक पुलिस इंस्पेक्टर के खिलाफ अवैध रिश्वत मांगने और लेने के मामले की सुनवाई को ठीक से आगे नहीं बढ़ाया। जुर्माना लगाने का कारण यह था कि अभियोजन पक्ष ने एक मुख्य गवाह को बहुत देर से दोबारा बुलाने की मांग की थी, जिसकी गवाही लगभग नौ साल पहले ही पूरी हो चुकी थी।

जस्टिस जे. श्रीनिवास राव, ACB मामले में आरोपी निज़ामाबाद के डिचपल्ली सर्कल के पुलिस इंस्पेक्टर डी. बालाजी द्वारा दायर एक आपराधिक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें मुख्य गवाह को क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के लिए दोबारा बुलाने की अनुमति दी गई थी। उनका तर्क था कि ट्रायल कोर्ट ने उनके जवाब में उठाए गए तर्कों पर ठीक से विचार किए बिना गलत तरीके से याचिका को मंज़ूरी दे दी।

जस्टिस राव ने कहा कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) की धारा 311 आपराधिक अदालतों को किसी भी चरण में गवाह को बुलाने, उनसे पूछताछ करने, दोबारा बुलाने या फिर से पूछताछ करने का व्यापक अधिकार देती है, जब न्यायपूर्ण और उचित फैसले के लिए ऐसी गवाही ज़रूरी हो। जज ने कहा कि कार्यवाही के चरण के बजाय गवाही की ज़रूरत और अहमियत ही निर्णायक बातें होती हैं। इसलिए, कोर्ट को मामले के मुख्य गवाह को दोबारा बुलाने में कोई गलती नहीं लगी।

साथ ही, जज ने अभियोजन पक्ष की गलती मानी और कहा कि उसने कार्यवाही को पूरी सावधानी और तत्परता से नहीं चलाया। कोर्ट ने गौर किया कि मुख्य गवाह की गवाही 2017 में पूरी हो गई थी, पहली बार दोबारा बुलाने की याचिका नवंबर 2024 में खारिज कर दी गई थी, और दूसरी याचिका तब दायर की गई जब मामला बहस के चरण में पहुँच चुका था।

यह मानते हुए कि वकील या अभियोजक की गलती के लिए आरोपी को नुकसान नहीं होना चाहिए, कोर्ट ने जुर्माना भरने की शर्त के साथ ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।

निज़ाम की संपत्तियों के बंटवारे का मामला - HC ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में दखल देने से इनकार किया

हैदराबाद: तेलंगाना हाई कोर्ट ने निज़ाम VII मीर उस्मान अली खान से जुड़ी पाँच संपत्तियों के बंटवारे और अलग कब्ज़े के लिए दायर मुकदमे के संबंध में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही में दखल देने से इनकार कर दिया है। जिन संपत्तियों का ज़िक्र किया गया था, उनमें यहाँ स्थित फलकनुमा पैलेस, चौमहल्ला पैलेस, पुरानी हवेली और किंग कोठी पैलेस, तथा तमिलनाडु में स्थित हेरवुड और सीडर्स बंगले शामिल थे।

मुक़दमे में यह घोषणा करने की भी मांग की गई थी कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड (बिक्री विलेख)...

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