हैदराबाद अध्ययन में पाया गया कि वायरल आरएनए पार्किंसंस से जुड़े आणविक परिवर्तनों को ट्रिगर कर सकता है
हैदराबाद: CSIR-सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB), हैदराबाद के रिसर्चर्स की एक स्टडी में पाया गया है कि इन्फ्लूएंजा और SARS-CoV-2 से होने वाले वायरल इन्फेक्शन, पार्किंसंस बीमारी से जुड़े प्रोटीन एग्रीगेट्स (प्रोटीन के गुच्छे) बनने से जुड़े मॉलिक्यूलर बदलावों को शुरू कर सकते हैं।
‘सेल रिपोर्ट्स’ में छपी इस स्टडी में देखा गया कि RNA वायरस, अल्फा-सिन्यूक्लिन नाम के प्रोटीन के साथ कैसे इंटरैक्ट करते हैं। यही प्रोटीन पार्किंसंस बीमारी वाले लोगों के दिमाग में एमाइलॉयड एग्रीगेट्स बनाता है।
रिसर्चर्स ने RNA हेलिकेस प्रोटीन DDX39A से जुड़े एक सेल्युलर मैकेनिज्म की पहचान की, जो इस प्रक्रिया को रोक सकता है।
वायरल RNA, RNA G-क्वाड्रुप्लेक्स (rG4s) नाम के खास थ्री-डायमेंशनल स्ट्रक्चर बना सकते हैं। स्टडी के अनुसार, ये स्ट्रक्चर अल्फा-सिन्यूक्लिन प्रोटीन के साथ इंटरैक्ट कर सकते हैं और इन्फेक्टेड सेल्स में इसके एग्रीगेशन (इकट्ठा होने) को बढ़ावा दे सकते हैं।
स्टडी में पाया गया कि जब सेल्स इन्फेक्टेड हुईं, तो DDX39A (एक प्रोटीन जो आम तौर पर सेल के न्यूक्लियस में होता है) साइटोप्लाज्म में चला गया।
यह वायरल RNA स्ट्रक्चर और अल्फा-सिन्यूक्लिन दोनों से जुड़ गया और rG4 स्ट्रक्चर को खोलने (unwind करने) में मदद की।
"यह अनवाइंडिंग वायरस को ठीक से रेप्लिकेट होने से रोकती है क्योंकि इसके RNA स्ट्रक्चर टूट जाते हैं, जिससे वायरल लोड कम हो जाता है।
साथ ही, यह अल्फा-सिन्यूक्लिन एमाइलॉयड बनने की प्रक्रिया को धीमा कर देता है," स्टडी की पहली लेखक आंचल ने कहा।
रिसर्चर्स ने कहा कि यह इंटरैक्शन उन मैकेनिज्म (जो सेल्स को वायरल इन्फेक्शन को कंट्रोल करने में मदद करते हैं) और उन प्रक्रियाओं (जो प्रोटीन एग्रीगेशन को बढ़ावा दे सकती हैं) के बीच एक संतुलन दिखाता है।
सेल के अंदर की स्थितियों के आधार पर, एक प्रक्रिया दूसरी पर हावी हो सकती है।
"भले ही सेल्स में वायरल इन्फेक्शन और एमाइलॉयड बनने से रोकने के लिए सुरक्षात्मक मैकेनिज्म हों, लेकिन ऐसी स्थितियां होती हैं जो एक तरह की प्रतिक्रिया को दूसरी पर प्राथमिकता देती हैं।
ये स्थितियां सेल्स में अंतिम नतीजों को तय करती हैं, और कभी-कभी वायरस से इन्फेक्टेड सेल्स में एमाइलॉयड बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है," स्टडी की अगुवाई करने वाली डॉ. स्वस्ति रायचौधरी ने कहा।
रिसर्चर्स ने चेतावनी दी कि इन नतीजों का मतलब यह नहीं है कि हर वायरल इन्फेक्शन से एमाइलॉयड का बनना या न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी होती है।
हालांकि, वे इस बात की जांच कर रहे थे कि क्या बार-बार वायरस के संपर्क में आने से न्यूरोडीजेनेरेशन से जुड़ी मॉलिक्यूलर प्रक्रियाओं पर असर पड़ सकता है। इस स्टडी से वायरल RNA स्ट्रक्चर, अल्फा-सिन्यूक्लिन के जमाव और सेल के एंटीवायरल रिस्पॉन्स के बीच एक संभावित मॉलिक्यूलर कड़ी का पता चला है।
रिसर्चर का कहना है कि यह समझने के लिए और रिसर्च की ज़रूरत है कि क्या आम वायरल इन्फेक्शन के बाद होने वाले ऐसे बदलाव, सालों बाद पार्किंसंस बीमारी का कारण बन सकते हैं।
अब टीम मॉलिक्यूलर प्रोसेस की बारीकी से स्टडी कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि वायरल इन्फेक्शन किस तरह न्यूरोडीजेनेरेशन (दिमाग की कोशिकाओं का खराब होना) से जुड़ी प्रक्रियाओं पर असर डाल सकते हैं।