हैदराबाद: तेलंगाना राज्य अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) आयोग ने बताया कि 2023 से 2026 के बीच अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के खिलाफ अपराधों के 9,102 मामले दर्ज किए गए, लेकिन इन तीन सालों में सिर्फ़ 32 लोगों को दोषी ठहराया गया। आयोग ने गुरुवार को जारी अपनी तीन साल की रिपोर्ट में ये आंकड़े शामिल किए।
सरकारी रिकॉर्ड का इस्तेमाल करते हुए आयोग ने बताया कि इन मामलों में 213 हत्याएं और महिलाओं व लड़कियों के खिलाफ यौन उत्पीड़न की 1,305 शिकायतें शामिल थीं। इसके अलावा, इन तीन सालों में आयोग को ज़मीन के विवाद, अत्याचार, नौकरी से जुड़े मामलों और दूसरी शिकायतों के बारे में 5,867 अर्जियां भी मिलीं।
विभागों और संस्थानों की समीक्षा
तेलंगाना SC/ST आयोग के चेयरमैन बक्की वेंकटय्या ने कहा कि आयोग ने SC/ST कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, नगर प्रशासन, सिंचाई और बिजली जैसे विभागों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, आरक्षण नियमों, रोस्टर और बैकलॉग रिक्तियों के कार्यान्वयन की समीक्षा की। साथ ही, आयोग ने सिंगरेनी, HMWSSB और GHMC जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की भी समीक्षा की और उस्मानिया व NIMS अस्पतालों में समीक्षा बैठकें कीं।
आयोग ने बताया कि उसने सभी 33 ज़िलों में समीक्षा बैठकें कीं और कुछ ज़िलों का दो या तीन बार दौरा किया। उसने ज़िला कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और पुलिस आयुक्तों से मुलाकात की। इसके अलावा, आयोग ने आवासीय स्कूलों और विश्वविद्यालयों - जिनमें उस्मानिया, काकतीय, तेलंगाना और राजीव गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉलेज टेक्नोलॉजीज़ (बसारा IIIT) शामिल हैं - का भी निरीक्षण किया और बसारा IIIT के लिए एक नियमित कुलपति (Vice-Chancellor) की नियुक्ति की सिफारिश की।
वे मामले जिनमें आयोग ने दखल दिया
रिपोर्ट में कई मामलों में आयोग के दखल का ज़िक्र है। उदाहरण के लिए, पुलिस की ज्यादती के एक कथित मामले में, आयोग ने शादनगर की दलित महिला सुनीता के मामले की समीक्षा की, जिसने पुलिस द्वारा प्रताड़ित किए जाने का आरोप लगाया था। नतीजतन, एक सर्कल इंस्पेक्टर और तीन अन्य कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया। इसी तरह, कमीशन ने विकाराबाद ज़िले के लगाचारला का भी दौरा किया, जहाँ आदिवासी महिलाओं ने ज़मीन अधिग्रहण की कोशिश के दौरान पुलिस द्वारा मारपीट का आरोप लगाया था, और संगारेड्डी जेल में पीड़ितों से मुलाक़ात की।
पुलिस कस्टडी में मौत के एक मामले में, नलगोंडा ज़िले में पुलिस कस्टडी में मारे गए कार्ला राजेश के परिवार को 4 लाख रुपये का मुआवज़ा मिला। इसी तरह, एक और मामले में, भद्राद्री कोठागुडेम ज़िले में दलित सब-इंस्पेक्टर श्रीरामुलु श्रीनिवास ने सीनियर अधिकारियों द्वारा कथित अपमान के बाद आत्महत्या कर ली। उनके परिवार को 8 लाख रुपये, पत्नी के लिए नौकरी और वारंगल में दो बेडरूम वाला घर मिला। संबंधित अधिकारियों के ख़िलाफ़ अत्याचार के मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा, कोमाराम भीम आसिफाबाद और आदिलाबाद ज़िलों में यौन हिंसा के मामलों में, परिवारों को 8-8 लाख रुपये मिले, और एक मामले में घर और नौकरी भी मिली।
जाति-आधारित हत्या के मामलों में, कमीशन ने माला बंटी (सूर्यापेट), एर्रा राजशेखर (शादनगर) और सल्लुरी मल्लेश (जगतियाल) के परिवारों से मुलाक़ात की और हर परिवार को 8 लाख रुपये का मुआवज़ा और घर दिलाने में मदद की। साथ ही, मेदक ज़िले के गौथोजि गुडा में सामाजिक बहिष्कार और मंदिर में प्रवेश के मामले में, 'डप्पू' (एक पारंपरिक वाद्य यंत्र) बजाने से इनकार करने पर एक परिवार का बहिष्कार किए जाने के बाद हुई सार्वजनिक जाँच में 30 से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किए गए। इसके अलावा, सिद्दीपेट और नारायणपेट ज़िलों में अनुसूचित जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश करने में मदद की गई। नारायणपेट में, एक पुजारी को सस्पेंड कर दिया गया जो सरकारी कर्मचारी भी था। आख़िर में, पटनचेरु इलाक़े में करोड़ों रुपये की आवंटित ज़मीन, जिसे ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से दूसरों को सौंप दिया गया था, दलित लाभार्थियों को वापस दिलाई गई।
पीड़ितों के लिए घर
कमिशन ने कहा कि उसने सरकार से हैदराबाद, साइबरबाद और मलकजगिरी पुलिस कमिश्नरेट की सीमाओं के भीतर अत्याचार के 1,000 पीड़ितों को दो बेडरूम वाले घर आवंटित करने के लिए एक विशेष सरकारी आदेश जारी करने का आग्रह किया था। अब तक लगभग 500 घर बांटे जा चुके हैं। आयोग ने इसे देश में एक अभूतपूर्व घटना बताया और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, आवास मंत्री पोंगूलेटी श्रीनिवास रेड्डी और रंगा रेड्डी जिले के प्रभारी मंत्री श्रीधर बाबू का धन्यवाद किया।
आयोग ने मुख्यमंत्री को 'हाई-पावर कमेटी' की बैठक बुलाने का श्रेय भी दिया। यह बैठक उनकी अध्यक्षता में साल में दो बार होनी चाहिए, और इस मामले को बार-बार उठाए जाने के बाद आखिरकार यह बैठक बुलाई गई।
आयोग द्वारा बताई गई समस्याएं
इन उपायों के बावजूद, आयोग के पास कमियों की एक लंबी सूची है। उदाहरण के लिए, आयोग ने कहा कि जातिगत भेदभाव अभी भी जारी है, जिसमें मंदिरों में प्रवेश न करने देना और त्योहारों के दौरान भेदभाव शामिल है। साथ ही, अंतर-जातीय जोड़ों को 'ऑनर किलिंग' (सम्मान के नाम पर हत्या) और वादा की गई सहायता न मिलने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, आयोग ने कहा कि पुलिस और राजस्व अधिकारी अक्सर लापरवाही बरतते हैं और पुलिस मामले दर्ज करने में ढिलाई दिखाती है। नतीजतन, पीड़ितों को मुआवज़ा पाने के लिए सालों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
आयोग ने 'बेस्ट अवेलेबल स्कूल्स' और विदेश में शिक्षा जैसी योजनाओं में फीस का बकाया बढ़ने और स्वरोज़गार से जुड़ी योजनाओं में देरी की ओर भी इशारा किया।