क्या मोदी सरकार के साथ जाएगी DMK? उदयनिधि स्टालिन ने दिया सीधा जवाब

Update: 2026-08-07 10:51 GMT
चेन्नई : परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावित विधेयक को लेकर तमिलनाडु की प्रमुख विपक्षी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयानिधि स्टालिन ने कहा है कि डीएमके शुरू से ही परिसीमन के मौजूदा प्रस्ताव का विरोध करती रही है और आगे भी उसका यही रुख रहेगा। उनके इस बयान को तमिलनाडु की राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि हाल के दिनों में ऐसी चर्चाएं तेज थीं कि डीएमके इस मुद्दे पर अपने रुख में नरमी ला सकती है।
उदयानिधि स्टालिन ने कहा कि परिसीमन का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इसे ऐसे प्रस्तुत कर रही है जैसे यह पहली बार सामने आया हो, जबकि डीएमके लगातार इस प्रस्ताव का विरोध करती रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पार्टी भविष्य में भी अपने पुराने रुख पर कायम रहेगी और राज्य के हितों से किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।
पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा चल रही थी कि डीएमके परिसीमन विधेयक पर सरकार के साथ समझौते का रास्ता तलाश सकती है। इन अटकलों के पीछे पार्टी की ओर से दिए गए कुछ संकेतों को कारण माना जा रहा था। हालांकि उदयानिधि स्टालिन के ताजा बयान ने इन सभी चर्चाओं पर विराम लगाने का प्रयास किया है। उन्होंने साफ कर दिया कि पार्टी का आधिकारिक रुख पहले जैसा ही है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।
इस मुद्दे ने उस समय और अधिक राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया था जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने तमिलनाडु दौरे के दौरान परिसीमन के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा था कि राज्य की सभी राजनीतिक पार्टियों को इसके खिलाफ एकजुट होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि कोई दल इस प्रस्ताव का समर्थन करता है तो वह तमिलनाडु की जनता के हितों के खिलाफ काम करेगा। राहुल गांधी ने समर्थन करने वालों के लिए तमिल शब्द "एट्टाप्पन" का इस्तेमाल किया था, जिसका अर्थ विश्वासघाती या गद्दार माना जाता है। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों के बीच इस विषय पर राजनीतिक बहस और तेज हो गई थी।
हालांकि इससे पहले कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि डीएमके सरकार के प्रस्तावित विधेयक का समर्थन करने पर विचार कर सकती है, यदि उसमें कुछ महत्वपूर्ण संशोधन किए जाएं। बताया गया था कि पार्टी ने तीन प्रमुख शर्तें सामने रखी थीं। पहली, परिसीमन का आधार वर्ष 2011 की जनगणना के बजाय 1971 की जनगणना को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखा जाए। दूसरी, सभी राज्यों की लोकसभा सीटों में समान रूप से लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाए, ताकि किसी राज्य को प्रतिनिधित्व के मामले में नुकसान न उठाना पड़े। तीसरी, विधेयक में स्पष्ट रूप से यह उल्लेख किया जाए कि प्रस्तावित परिसीमन के बाद किस राज्य में कितनी सीटें बढ़ाई जाएंगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके की इन मांगों का उद्देश्य दक्षिण भारतीय राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखना है। पार्टी का तर्क रहा है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें लोकसभा सीटों के मामले में नुकसान नहीं होना चाहिए। यदि केवल नवीनतम जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाता है तो दक्षिण भारत के कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम हो सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
डीएमके का संसद में भी महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है। लोकसभा में उसके 22 और राज्यसभा में 8 सदस्य हैं। ऐसे में किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक पर पार्टी का रुख राजनीतिक दृष्टि से काफी अहम माना जाता है। यही कारण है कि परिसीमन के मुद्दे पर डीएमके के हर बयान पर राष्ट्रीय राजनीति की नजर बनी हुई है।
उल्लेखनीय है कि पिछली बार जब परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर चर्चा हुई थी, तब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष की कुछ चिंताओं को दूर करने का आश्वासन दिया था। इसके बावजूद दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल इस विषय पर अपनी आशंकाएं लगातार व्यक्त करते रहे हैं।
उदयानिधि स्टालिन के ताजा बयान से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि डीएमके फिलहाल परिसीमन के मौजूदा स्वरूप का समर्थन करने के पक्ष में नहीं है। पार्टी का कहना है कि वह तमिलनाडु के हितों और समान प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर कायम रहेगी। आने वाले समय में यदि केंद्र सरकार इस विधेयक को संसद में पेश करती है तो इस विषय पर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है, क्योंकि यह केवल तमिलनाडु ही नहीं बल्कि देश के कई राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुका है।
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