ऊटी: रविवार दोपहर से नीलगिरि में भारी बारिश हो रही है। इससे पहले एक दिन के लिए बारिश रुकी हुई थी। इसे देखते हुए, नीलगिरि डॉक्यूमेंटेशन सेंटर (NDC) ने राज्य आपदा प्रबंधन विभाग और नीलगिरि तथा कोयंबटूर के अधिकारियों से अपील की है कि वे इस इलाके में भूस्खलन (landslide) के इतिहास और सतर्कता के बारे में और अधिक डेटा इकट्ठा करें।

NDC के निदेशक डी. वेणुगोपाल ने कहा कि कुन्नूर-मेट्टुपलायम राजमार्ग पर बुरलियार में हुआ भूस्खलन, आपदा प्रबंधन अधिकारियों की जानकारी और सतर्कता की कमी को दर्शाता है। जानकारी से पता चलता है कि यहाँ भूस्खलन होने की संभावना काफी समय से बनी हुई थी। अगर समय रहते बचाव के उपाय किए गए होते, तो इस त्रासदी को पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता था, लेकिन इसके असर को कम जरूर किया जा सकता था।

बुरलियार की ढलानें नीलगिरि के सबसे पुराने और सबसे खड़े पहाड़ी हिस्सों में से एक हैं। यहाँ मूल निवासी 'इरुला' और 'कुरुम्बा' समुदाय के लोग रहते हैं, जो हजारों सालों से प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रह रहे हैं। जब मेट्टुपलायम-कुन्नूर सड़क बनी, तो नीलगिरि और कोयंबटूर की सीमा पर स्थित बुरलियार, सड़क यात्रियों के लिए एक पड़ाव बन गया। रेलवे के आने के बाद यहाँ आवाजाही कम हो गई, लेकिन आजादी के बाद यह फिर से वाहनों के रुकने की एक व्यस्त जगह बन गई।

1996-97 के बाद बुरलियार के पर्यावरण को नुकसान पहुँचना शुरू हुआ, जब बाहरी व्यावसायिक हितों वाले लोगों ने कुछ बड़ी परियोजनाओं के साथ इस इलाके में दखल देना शुरू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि 1998, 2009 और 2015 में यहाँ के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचा। 1978 में जब इस जिले में पहली बार भूस्खलन हुआ, तब से ही विशेषज्ञ इस पर गहन शोध कर रहे हैं। हालाँकि, बाद की सरकारों या प्रशासनों ने कभी भी इन महत्वपूर्ण रिपोर्टों के निष्कर्षों या चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया।

2012 और 2013 में, दो वैज्ञानिकों ने बुरलियार से कुन्नूर तक के परिवहन मार्गों पर बारिश के कारण होने वाले भूस्खलन के खतरों और जोखिमों का गहराई से अध्ययन किया। नीलगिरि में भूस्खलन के जोखिम का आकलन करने के लिए अब तक उपलब्ध यह एकमात्र विस्तृत अध्ययन है। इसमें अलग-अलग ढलानों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष जोखिमों के साथ-साथ, बारिश की उस सीमा (threshold) का भी पता लगाया गया, जिस पर भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि अगर राज्य में आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों को ऐसी रिपोर्टों के निष्कर्षों और सुझावों की जानकारी होती, तो इस इलाके में जान-माल के नुकसान को रोका जा सकता था।

उन्होंने सुझाव दिया कि मानसून के दौरान आपदा प्रबंधन के तहत, राज्य आपदा प्रबंधन विभाग और नीलगिरी तथा कोयंबटूर के अधिकारियों को जिले में भूस्खलन पर हो रहे अध्ययनों के निष्कर्षों और सुझावों को इकट्ठा करना चाहिए, और बेहतर तैयारी के लिए उन्हें जनता के साथ साझा करना चाहिए।

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