Tamil Nadu तमिलनाडु: अल नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए देश के कई राज्यों में सूखे की स्थिति बनने की आशंका जताई गई है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने एहतियात के तौर पर किसानों को कम अवधि में तैयार होने वाली फसलें उगाने की सलाह दी है, ताकि कम बारिश की स्थिति में भी कृषि उत्पादन को कुछ हद तक सुरक्षित रखा जा सके।

जानकारी के अनुसार, अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमीय घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के सतही जल का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इस बदलाव का असर वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है। इसके कारण कई क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में असंतुलन देखा जाता है। कहीं अत्यधिक बारिश होती है तो कहीं लंबे समय तक सूखा जैसी स्थिति बन जाती है।

मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस साल भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य औसत से कम रह सकता है। मानसून में कमी का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है।

भारत में कृषि कार्य को मुख्य रूप से तीन मौसमों में बांटा गया है— खरीफ, रबी और ग्रीष्मकालीन फसलें। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अनुसार खरीफ मौसम जून से सितंबर तक, रबी मौसम अक्टूबर से जनवरी तक और गर्मी का मौसम फरवरी से मई तक माना जाता है। इन्हीं मौसमों के आधार पर फसल उत्पादन की योजना तैयार की जाती है।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि बारिश की स्थिति के आधार पर फसलों की अवधि तय की जाती है। इसमें लंबी अवधि की फसलें (लगभग 6 महीने), मध्यम अवधि की फसलें (लगभग 4 महीने) और कम अवधि की फसलें (लगभग 2 महीने) शामिल होती हैं। कम बारिश की स्थिति में किसानों को कम समय में तैयार होने वाली फसलों की ओर ध्यान देने की सलाह दी जा रही है, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।

अल नीनो के संभावित असर को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश समेत देश के लगभग 27 राज्यों के 226 जिलों में इस वर्ष सामान्य से कम वर्षा हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका भी जताई गई है।

तमिलनाडु के 12 जिलों को विशेष रूप से संवेदनशील माना गया है, जहां बारिश की कमी का असर अधिक देखने को मिल सकता है। इन क्षेत्रों में कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ने की संभावना है, जिससे किसानों की आय और फसल चक्र प्रभावित हो सकता है।

कृषि मंत्रालय की ओर से राज्यों को पहले ही सतर्क किया गया है और वैकल्पिक खेती के मॉडल अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके तहत किसानों को ऐसी फसलें चुनने की सलाह दी जा रही है जो कम पानी में भी तैयार हो सकें और जिनकी अवधि कम हो।

इसके साथ ही बीज, सिंचाई और कृषि संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए भी तैयारी की जा रही है। राज्य सरकारों को निर्देश दिए गए हैं कि वे जिला स्तर पर स्थिति की निगरानी करें और किसानों को समय पर जानकारी उपलब्ध कराएं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अल नीनो का प्रभाव कृषि अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकता है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों के उत्पादन में गिरावट देखी जा सकती है। ऐसे में किसानों के लिए फसल योजना में बदलाव जरूरी माना जा रहा है।

सरकार का उद्देश्य है कि संभावित सूखे की स्थिति में किसानों को नुकसान से बचाया जा सके और कृषि उत्पादन में स्थिरता बनी रहे। इसके लिए जल संरक्षण, वैकल्पिक फसलें और तकनीकी सहायता पर भी जोर दिया जा रहा है।

कुल मिलाकर, अल नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए देश के कई हिस्सों में कृषि नीति और फसल योजना में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी गई है, ताकि कम बारिश की स्थिति में भी खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर ज्यादा असर न पड़े।

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